CARRY MARKS SEM 2 SESSI 2013/2014 DEGREE

CTU553: BM2325B

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2012179411 8 8 7.5 14 37.5
2 2012940543 9 8.5 7.5 14 39
3 2012719325 10 8 8 14 40
5 2012958035 8.5 8 7.5 14 38
6 2012583621 11.5 8 8 13 40.5
7 2012576345 9.5 8 7.5 14.5 39.5
8 2012979529 10 8 8 14.5 40.5
9 2012928479 7 8 7.5 14 36.5
10 2012915127 8.5 8 7.5 14 38
11 2012118519 7.5 7.5 8 14 37
12 2012184259 12 7.5 9 13 41.5
13 2012144505 9.5 7.5 7.5 14 38.5
14 2012850458 7.5 8 7.5 14 37
15 2012314825 7 7.5 8 13 35.5
16 2012744441 10 9 7.5 14 40.5
17 2012386841 7.5 8 7.5 14.5 37.5
18 2012964143 9 8 7.5 14.5 39
19 2012777605 7.5 7.5 7.5 14 36.5
20 2012770019 10 7.5 8 13 38.5
21 2012107937 10 8.5 7.5 14 40
22 2012723587 7.5 7.5 7.5 14 36.5
23 2012362705 7 8.5 7.5 14 37

CTU555: AT220 3A

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2013690874 9.5 8.5 8 14 40
2 2013652274 13 8.5 8 9 38.5
3 2013404664 11.5 8.5 7 13 40
4 2013813066 8 8.5 8 14 38.5
5 2013211856 14 7.5 7.5 9 38
6 2013896804 9.5 8.5 8 9 35
7 2013470172 9.5 8.5 7 9 34
8 2013228208 10 9 7.5 11 37.5
9 2013207264 12.5 8.5 8 14 43
10 2013637128 10.5 8 7 13 38.5
11 2013877846 11 8.5 7.5 11 38
12 2013404622 9.5 8 7 13 37.5
13 2013890832 13 7.5 7.5 9 37
14 2013623234 8.5 8.5 7.5 11 35.5
15 2013207024 9 9 8 14 40
16 2013290746 12 8.5 8 9 37.5
17 2013886576 10 8.5 7 13 38.5
18 2013445928 7.5 8.5 8.5 14 38.5
19 2013638242 10 8 7.5 9 34.5
20 2013487894 9 8.5 8 14 39.5
21 2013490216 8.5 7.5 7.5 9 32.5
22 2013464276 11.5 9 8 14 42.5
23 2013645344 9 8.5 7.5 14 39
24 2013695344 8 8.5 7 11 34.5

CTU553: AS202 2A

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2012988271 8.5 7.5 9 13 38
2 2012769175 10 7 7.5 14 38.5
3 2012149335 7.5 7.5 8.5 13 36.5
4 2012980777 7 7.5 7 14 35.5
5 2012789891 8.5 8.5 8 14 39
6 2012905803 7.5 7.5 8.5 13 36.5
7 2012343453 11 7.5 8 14 40.5
8 2012996005 8.5 7.5 8 14 38
9 2012970363 12 8 8 14 42
10 2012771899 11 7.5 7 14 39.5
11 2012729791 8 8 8 14 38
12 2012980997 7 7 8 14 36
13 2012568983 8.5 8 7 14 37.5
14 2012754421 7.5 8 7 14 36.5
15 2012396263 10 7.5 8.5 13 39
16 2012395573 10 8 8 14 40

CTU555: AS202 3A

Bil No Pelajar Mid Akt Prnst KK Total
1 2013742217 8 7 7.5 10 32.5
2 2013590739 8 7.5 8 14 37.5
3 2013112587 10 7 8 12 37
4 2013730757 9.5 6.5 7.5 10 33.5
5 2013569217 7 7 8 10 32
6 2013177109 9 7.5 7.5 12 36
7 2013724185 9 7.5 8 12 36.5
8 2013158389 10 7.5 7.5 14 39
9 2013508313 9.5 7 7.5 10 34
10 2013992913 9 7.5 7.5 14 38
11 2013398933 9.5 7 7.5 14 38
12 2013728173 7 8 8 12 35

CTU553: AC220 4A

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2013148493 11 7.5 8 9 35.5
2 2013147065 8 8.5 7.5 9 33
3 2013773251 11 8 8 9 36
4 2013372669 9 7.5 8 9 33.5
5 2013154295 7 8 7.5 9 31.5
6 2012288716 10.5 8 9 14 41.5
7 2012696254 9.5 7.5 8 14 39
8 2013948099 10 7 8 9 34
9 2013963357 9 7.5 7.5 9 33
10 2013343143 9.5 8 9 14 40.5
11 2013963439 9 8 7.5 14 38.5
12 2013103139 8 7.5 7.5 14 37
13 2012441628 8 8 8 14 38
14 2012875756 7 8.5 8 14 37.5
15 2012618276 8.5 8.5 9 14 40
16 2013347507 8 5.5 7.5 9 30
17 2013988681 8 8.5 8 9 33.5
18 2013573575 10.5 8.5 7.5 14 40.5
19 2013709417 9 7.5 7 11 34.5
20 2012666828 8 8.5 8 14 38.5
21 2013335625 7 7 8 11 33
22 2013522263 7.5 7.5 8 9 32
23 2012848508 10.5 8.5 9 14 42
24 2012207148 8 8.5 8 14 38.5
25 2013708457 13 7 8 9 37
26 2013319015 7 8.5 7 11 33.5

 CTU555: AM228 3C

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Attn
1 2013711483 8 8.5 7 9 32.5
2 2013928855 9 8 7.5 9 33.5
3 2013584961 7.5 8 7.5 9 32
4 2013545397 12 8 7.5 8.5 36
5 2013318369 8.5 8 8 9 33.5
6 2013922353 10 8.5 7.5 9 35
7 2013159479 8.5 7.5 7.5 9 32.5
8 2013774821 7.5 8 7.5 8.5 31.5
9 2013526743 11 8 7.5 9 35.5
10 2013566375 11 8 8 9 36
11 2013588097 8.5 7 8 9 32.5
12 2013529565 11 8 7 9 35
13 2013374703 11 8 8 9 36
14 2013139851 10.5 8 7 9 34.5
15 2013530009 9.5 8.5 7.5 8.5 34
16 2013178783 10 8 8 9 35
17 2013508525 9.5 8 7.5 8.5 33.5
18 2013778783 8.5 8 7 9 32.5
19 2013713419 11 8 7 9 35
20 2013507215 10 8.5 7.5 9 35
21 2013106315 11 8.5 7.5 9 36
22 2013375089 9 8.5 7.5 9 34
23 2013583907 8 8 8 14 38
24 2013345311 7.5 8 8 9 32.5
25 2013983521 8.5 8 7.5 9 33
26 2013389783 8 8.5 7.5 9 33
27 2013502149 10 8.5 7.5 9 35
28 2013328051 8 7.5 7.5 9 32
29 2013139605 11 7.5 7.5 9 35
30 2013397015 10.5 8 8 9 35.5
31 2013756865 9 7 7.5 9 32.5
32 2013913969 11 8 7.5 9 35.5
33 2013116015 10 8 7.5 9 34.5
34 2013787361 9 8 7.5 9 33.5
35 2013180449 11 7.5 7.5 9 35

CTU555: BM2424A

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2013655848 9 7. 5 8 10 34.5
2 2013831732 9 7.5 7.5 9 33
3 2013233948 11 8.5 8 12 39.5
4 2013472464 11 7.5 8 12 38.5
5 2013420014 8.5 7.5 8 12 36
6 2013477054 9 7.5 8 12 36.5
7 2013804378 9.5 7.5 8 12 37
8 2013496788 9 8.5 7.5 9 34
9 2013655206 9 8 7.5 9 33.5
10 2013825482 9 7.5 7.5 9 33
11 2013874082 10.5 7.5 8 12 38
12 2013860276 11 9 8 12 40
13 2013816472 7.5 7.5 8 12 35

 CTU555: BM2424B

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2013671046 9.5 7.5 7.5 13 37.5
2 2013299296 9.5 8.5 7.5 13 38.5
3 2013241668 8.5 8 7.5 9 33
4 2013689872 11.5 8 7.5 9 36
5 2013420646 10.5 8 8 14 40.5
6 2013822998 9.5 7.5 7.5 9 33.5
7 2013604548 6.5 7 7.5 9 30
8 2013617536 9 7.5 8 14 38.5
9 2013422678 9.5 7.5 8 9 34
10 2013412414 9.5 7.5 8 10 35
11 2013868692 8 4.5 7.5 9 29
12 2013469918 8.5 8.5 7.5 13 37.5
13 2013295228 10 8.5 7.5 13 39
14 2013665504 10 7.5 7.5 10 35
15 2013815464 7.5 7.5 7.5 10 32.5
16 2013682694 10 7.5 7.5 10 35
17 2013408044 9.5 5.5 8 10 33
18 2013820236 7 7.5 7.5 9 31
19 2013454632 7.5 8.5 8 14 38
20 2013834594 9.5 7.5 8 10 35
21 2013407322 7 7.5 7.5 9 31
22 2013593881 8.5 7.5 7.5 9 32.5
23 2013407488 6.5 7.5 8 10 32
24 2013816774 9.5 7.5 7.5 10 34.5

CTU553: BM222 4A

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2012695984 9.5 8.5 8 10 36
2 2012259148 9 8.5 7 10 34.5
3 2012663466 7 3.5 8 13 31.5
4 2012432382 10.5 7.5 8 10 36
5 2012864484 8.5 7.5 7 10 33
6 2012473044 10 8.5 8 10 36.5
7 2012466314 7 7.5 7.5 9 31
8 2012453106 9 7 7.5 9 32.5
9 2012462258 7.5 5.5 7.5 10 30.5
10 2012415424 10.5 8.5 8 10 37

CTU551: BM232 2A

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2013498946 8 8 7 10 33
2 2013459496 7 8 7 10 32
3 2013694674 9 8 7.5 9 33.5
4 2013248014 9.5 8.5 7.5 10 35.5
5 2013267938 8.5 8.5 7 10 34
6 2013650878 6 8 7 10 31
7 2013264814 6 8.5 7.5 10 32
8 2013867658 8.5 8.5 7 10 34
9 2013459512 8.5 8 8 10 34.5
10 2013627642 7.5 8 7 12 34.5
11 2013688794 7 8 7.5 9 31.5
12 2013865348 8.5 8 7.5 9 33
13 2013253292 10 8 7 10 35
14 2013469358 8.5 8 7 12 35.5
15 2013681542 8.5 8 7.5 9 33
16 2013288696 10 8 7.5 9 34.5
17 2013810892 7.5 8 7.5 9 32
18 2013850872 8 8 7.5 9 32.5
19 2013473866 9.5 8 8 10 35.5
20 2013840272 8.5 8.5 7 12 36
21 2013449678 11 8 8 10 37
22 2013467474 9.5 8 8 10 35.5
23 2013295722 8.5 8 8 9 33.5
24 2013643682 7 8 7 12 34

CTU551: BM232 2B

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2013403198 9 8 8 14 39
2 2013284732 10 8 8 11 37
3 2013202238 9 8.5 8 12 37.5
4 2013283712 8.5 8 7.5 10 34
5 2013423622 8 8.5 7.5 10 34
6 2013870918 10 8.5 7.5 10 36
7 2013479214 9.5 8 8 13 38.5
8 2013628818 8.5 8 8 12 36.5
9 2013855216 9 8 7.5 13 37.5
10 2013857582 6 7 8 14 35
11 2013443176 8.5 8 8 14 38.5
12 2013211816 12 8 9 14 43
13 2013234428 9 8 8 11 36
14 2013804474 11 8 7.5 13 39.5
15 2013616174 10 8 8 14 40
16 2013239948 8.5 8 8 11 35.5
17 2013890068 8.5 8.5 8 12 37
18 2013874862 8.5 8.5 8 12 37
19 2013831658 11 8 8 14 41
20 2013465596 7 8 8 14 37
21 2013871144 10.5 8 8 13 39.5
22 2013663122 7 8 8 14 37
23 2013644572 9 8 8 11 36

CTU553: BM232 5A

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2012179411 8 8 7.5 14 37.5
2 2012940543 9 8.5 7.5 14 39
3 2012719325 10 8 8 14 40
5 2012958035 8.5 8 7.5 14 38
6 2012583621 11.5 8 8 13 40.5
7 2012576345 9.5 8 7.5 14.5 39.5
8 2012979529 10 8 8 14.5 40.5
9 2012928479 7 8 7.5 14 36.5
10 2012915127 8.5 8 7.5 14 38
11 2012118519 7.5 7.5 8 14 37
12 2012184259 12 7.5 9 13 41.5
13 2012144505 9.5 7.5 7.5 14 38.5
14 2012850458 7.5 8 7.5 14 37
15 2012314825 7 7.5 8 13 35.5
16 2012744441 10 9 7.5 14 40.5
17 2012386841 7.5 8 7.5 14.5 37.5
18 2012964143 9 8 7.5 14.5 39
19 2012777605 7.5 7.5 7.5 14 36.5
20 2012770019 10 7.5 8 13 38.5
21 2012107937 10 8.5 7.5 14 40
22 2012723587 7.5 7.5 7.5 14 36.5
23 2012362705 7 8.5 7.5 14 37

 

CTU553: BM240 4A

Bil No Pelajar Mid Akt Psnt KK Total
1 2012397257 10 7 7.5 9 33.5
2 2012136755 8.5 4 7.5 9 29
3 2012918289 9 7 7 13 36
4 2012765563 10 8 7.5 8 33.5
5 2012594937 8 6 7 9 30
6 2012763605 7.5 7.5 8 13 36
7 2012950417 10 6 7 9 32
8 2012975357 8 7 7.5 13 35.5
9 2012313529 9.5 6.5 7 13 36
10 2012375113 8 7 7.5 9 31.5
11 2012844992 10 4 8 10 32
12 2012224234 9.5 8 7.5 10 35
13 2012321333 8 8 7.5 9 32.5
14 2012762575 9 7 8 14 38
15 2012771939 11 6 7 9 33
16 2012727019 8 2 7.5 9 26.5
17 2012351237 11 6 7.5 9 33.5
18 2012528879 9.5 8 8 14 39.5
19 2012351643 9 7.5 7.5 9 33
20 2012314097 7.5 8.5 7.5 9 32.5

CTU553: BM240 4B

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2012340813 8.5 7 7.5 9 32
2 2012908675 8.5 5 7.5 9 30
3 2012323731 8 3.5 7.5 9 28
4 2012121299 10 5 7 9 31

 

CTU555: SR243 3A

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2013527247 7 8.5 8 9 32.5
2 2013984101 9 8 7.5 8 32.5
3 2013728257 8.5 8.5 7.5 8 32.5
4 2013522417 9 7.5 7.5 8 32
5 2013734279 9 8 8 9 34
6 2013748387 11.5 8.5 7 10 37
7 2013177141 9.5 7 7 9 32.5
8 2013184481 7.5 8 7.5 8 31
9 2013737105 8 8 7 10 33
10 2013395789 8 6.5 7.5 8 30
11 2013716783 8.5 8 8 9 33.5
12 2013908093 11 8 7.5 8 34.5
13 2013314159 9.5 8 8 8 33.5
14 2013540627 9 8 7.5 8 32.5

CTU555: SR243 3B

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2013744551 7 8 8 9 32
2 2013928685 8 8 8 8 32
3 2013555053 9.5 8.5 7.5 8 33.5
4 2013125331 9 8 7 9 33
5 2013100039 9.5 8.5 7.5 8 33.5
6 2013746725 8.5 8.5 7 10 34
7 2013167409 8.5 8 7.5 8 32
8 2013973771 8 8 8 8 32
9 2013535057 8.5 8 7 9 32.5
10 2013995841 9 8 7.5 8 32.5
11 2013975493 9.5 8.5 7.5 8 33.5
12 2013930069 8 8 7 9 32
13 2013905131 9 7.5 7.5 8 32

 

CTU553: BM220 4A

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2012478026 10 8 7 10 35
2 2012891522 9.5 8 7.5 9 34
3 2012679582 8 6.5 7.5 9 31
4 2012672616 7.5 8 8 13 36.5
5 2012208724 9.5 6 7.5 9 32
6 2012644604 10.5 7.5 8.5 14 40.5
7 2012660782 8.5 8 8.5 14 39
8 2012828762 7.5 4 8 9 28.5
9 2012717625 8.5 7 7.5 9 32
10 2012685374 9 8 8.5 14 39.5
11 2012294576 9.5 6.5 8 9 33
12 2012203634 9.5 8 7.5 10 35
13 2012226558 9.5 5.5 8 9 32
14 2012640912 8.5 8 8 14 38.5
15 2012466216 8.5 8.5 8 12 37
16 2012894014 6 8 8 13 35
17 2012236316 7.5 8 8 14 37.5
18 2012488496 9.5 7 7 10 33.5
19 2012429312 7.5 6.5 8 9 31
20 2012601834 7 7.5 7.5 10 32
21 2012432022 8.5 7.5 8 14 38
22 2012602988 9 8 8 9 34
23 2012690486 7.5 8 7.5 10 33
24 2012765503 8 7.5 7.5 9 32
25 2012696354 9.5 7.5 8 12 37
26 2012327135 8.5 7 7.5 9 32

CTU553: BM220 4B

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2012201776 8.5 8 7.5 10 34
2 2012818722 9.5 6 7 10 32.5
3 2012695654 8.5 5.5 8 12 34
4 2012608046 10.5 7 7 10 34.5

 

CTU553: BM242 4A

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2012105857 7 3.5 7.5 10 28
2 2012315393 6.5 3.5 7.5 10 27.5
3 2012704495 6.5 4.5 7.5 10 28.5

CTU553: BM242 4B

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2012125925 11 7 7.5 13 38.5
2 2012557509 8 8 8 10 34
3 2012954419 7.5 6.5 7.5 13 34.5
4 2012336313 9 5.5 7.5 13 35

 

CTU555: 240 4A

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2013827974 9.5 8 7 10 34.5
2 2012935619 10 8 8 14 40
3 2013459172 8.5 7 7 10 32.5
4 2013638768 8 8 7.5 14 37.5
5 2013669638 10 8 7 10 35
6 2013625948 9.5 8 7.5 9 34
7 2013450874 7.5 7.5 7 10 32
8 2013687656 8 8 8 14 38
9 2013836276 9.5 7 6 10 32.5
10 2013879788 8 6.5 7 8 29.5
11 2013873046 8.5 8 7.5 10 34
12 2013691736 8.5 7.5 7 8 31
13 2013622502 7.5 8 7.5 14 37
14 2013219498 8.5 8 7.5 14 38
15 2013848764 7 7.5 7.5 9 31
16 2013222508 10 8 8 14 40
17 2013818894 7 6 6 10 29
18 2013898112 11 8 7.5 10 36.5
19 2013431018 9 8 7.5 14 38.5
20 2013869008 8.5 7.5 7.5 9 32.5
21 2013266792 10 6 7.5 12 35.5
22 2013454442 8 8 7.5 10 33.5
23 2013425242 7 7.5 8 9 31.5
24 2013670228 8 8 8 12 36
25 2013601724 8 7 6 10 31
26 2013600672 8 6.5 8 12 34.5
27 2013465908 7.5 7.5 7.5 9 31.5

CTU555: BM240 4B

Bil No Pelajar Mid Akt Prsnt KK Total
1 2013478724 10 7 7 13 37
2 2013897324 9 8 7 10 34
3 2013278506 7 8 7.5 12 34.5
4 2013699958 11 7.5 7 7.5 33
5 2013236668 10 8 7.5 9 34.5
6 2013486588 9 7 7 13 36
7 2013261966 9.5 7 7 7.5 31
8 2013463802 7.5 8 7.5 12 35
9 2013891788 10.5 8 7.5 12 38
10 2013402584 10.5 7 7 13 37.5
11 2013221912 9.5 8 7.5 8 33
12 2013612428 14 6 8 9 37
13 2013289236 10 7 7 7.5 31.5
14 2013213432 7 5.5 6 10 28.5
15 2013449808 7.5 8 8 8 31.5
16 2013499272 8.5 8 7.5 8 32
17 2013824798 9.5 5 7 7.5 29
18 2013875844 7.5 8 8 12 35.5
19 2013221144 7 7 7.5 8 29.5
20 2013696986 11 8 7.5 12 38.5
21 2013695936 7 7 7.5 8 29.5
22 2013248512 10.5 7 7 13 37.5
23 2013602718 7 7 7.5 8 29.5
24 2013293516 9 8 7.5 9 33.5
25 2013219536 8.5 8 8 8 32.5
26 2013472566 8 7 7.5 9 31.5
27 2013647202 9 7 7.5 8 31.5
28 2013688688 9 6 7.5 9 31.5
29 2013453988 7.5 7 8 9 31.5
30 2013416558 9 7 8 9 33

 

CTU551: QAMA3

Bil No Pelajar Mid Kuiz KK Total
1 2013321233 6 16 14 36
2 2013969429 7 15 13 35
3 2013587597 8 16 13 37
4 2013978275 7.5 15 14 36.5
5 2013146663 7 10.5 12 29.5
6 2013310441 6.5 16 12 34.5
7 2013520629 9.5 18.5 14 42
8 2013786149 5.5 14.5 14 34
9 2013781353 6.5 11 12 29.5
10 2013782229 5.5 16 10 31.5
11 2013901917 7 15 13 35
12 2013598909 9 14 13 36
14 2009510085 7.5 15 12 34.5
15 2013198535 5 16 14 35
16 2013935245 10.5 13.5 14 38
18 2013747971 7 16 14 37
19 2013973745 8 13.5 13 34.5

CTU551: BM2201K

Bil No Pelajar Mid Kuiz KK Total
1 2009816642 8 16 13 37
2 2009256108 8 15.5 14 37.5
3 2010273332 8 16.5 12 36.5
4 2010857212 11.5 11.5 13 36

CTU551: QBMM2

Bil No Pelajar Mid Kuiz KK Total
1 2013207666 7.5 17 12 36.5
2 2013635672 7 16 14 37
3 2013880148 9.5 17 13 39.5
4 2013206586 6.5 16 13 35.5

 

PEPERIKSAAN PERTENGAHAN SEMESTER

Peperiksaan Pertengahan Semester (Test 1) akan diadakan pada minggu kesembilan perkuliahan berdasarkan sukatan.

CTU553/555

Disebabkan pada minggu itu hari khamis jatuh pada 1 Mei (Cuti Buruh) maka kelas hari tersebut akan mengambil peperiksaan minggu berikutnya:

BM232 5A – ISNIN – 28 APRIL 2014 – 4.15-5.30 – A 1005 (KAMPUS 2)
BM240 (555) – SELASA – 29 APRIL 2014 – 10.15-11.30 – AUDI 2
AT2203A (553/555) – SELASA – 29 APRIL 2014 – 2.30-3.45 – DK 2
BM240 (553) – SELASA – 29 APRIL 2014 – 4.15-5.30 – AUDI 2
BM2224/2424 – SELASA – 29 APRIL 2014 – 4.15-5.30 – AUDI 2
SR2433A/B (555) – SELASA – 29 APRIL 2014 – 4.15-5.30 – AUDI 2
BM232 5B – RABU – 7 Mei 2014 – 10.15- 11.30 – B317
AM228 – RABU- 7 Mei 2014 – 2.15-3.30 – B5014 (KAMPUS 2)
AS202 – RABU – 7 Mei 2014 – 7.30-8.45 – G115
AC220 – JUMAAT – 2 MEI 2014 – 8.15-9.30 – G211

Note:
Pelajar yang sepatutnya membuat pembentangan pada minggu kesembilan dianjakkan kepada minggu kesepuluh. Bermula minggu kesepuluh semua kelas akan membuat pembentangan lebih dari satu kumpulan seminggu kecuali group BM232 5A/B dan AC220.
Kelas ganti akan diadakan kepada kelas-kelas yang lambat memulakan sessi perkuliahan iaitu group AS202 dan AM283. Group lain adalah tertakluk kepada keadaan.

CTU 551

BM232 – JUMAAT – 9 MEI 2014 – 2.45-4.00 – DK 2
(pembentangan akan diadakan seperti biasa pada pukul 2.00 petang)

Peperiksaan berlangsung selama 1 jam 15 minit. Pelajar tidak perlu membawa sebarang kertas.
Soalan-soalan adalah berdasarkan Bab 1-3 sahaja.

Maruwiah Ahmat

Belajar Cara Saya

Saya mempunyai beberapa panduan untuk menjadi pelajar cemerlang. Cuba ikuti langkah-langkah berikut:

1. Bertindak dari awal semester, kita telah mengetahui kalender akademik keseluruhan semester, jadi kita boleh merancang bila masa kuliah, peperiksaan, cuti, perayaan dan lain-lain. Oleh itu kita mengetahui bila masanya kita patut bersedia untuk menyiapkan tugasan, menghadapi peperiksaan dan membuat latihan amali.

2. Buat jadual harian bagi setiap jam tujuh hari seminggu. Masukkan semua subjek yang kita ambil termasuk luangkan masa untuk membuat kertas kerja atau latihan amali di luar waktu kelas. Ini untuk mengelakkan kita terlupa mengulang kaji mana-mana subjek dalam masa seminggu.

3. Rancang tugasan yang diberikan oleh pensyarah dari awal bagi setiap subjek, ini untuk mengelakkan kita membuat kerja di saat-saat akhir dan hasilnya kerja yang tidak memuaskan kerana pada minggu-minggu akhir mungkin akan banyak kelas tambahan dan beberapa ujian (kuiz) akan dijalankan.

4. Membiasakan diri mencari bahan tambahan bagi kuliah yang diajar, dekatkan diri dengan perpustakaan, dan membiasakan diri mencari bahan tambahan di internet. Pahatkan dalam minda, kita belajar di universiti hanya diberi panduan bukan disuap sahaja semuanya.

5. Jangan tinggalkan solat (pelajar Muslim), mana-mana solat yang tertinggal secara tidak sengaja seperti solat subuh, qadha’ dengan segera, pahat dalam hati kita tidak tahu bila saat kematian kita, dibimbangi kita akan berhutang dengan Allah SWT. Kalau boleh bacalah Al-Quran setiap pagi sebelum membaca sesuatu yang lain, walaupun 2-3 ayat.  Jangan tidur selepas subuh, bersedia lebih awal untuk ke kelas. Jika kelas bermula lambat, pergilah mencari kelas kosong untuk membuat ulang kaji terlebih dahulu atau ke perpustakaan. Jangan hiasi waktu pagi dengan perkara-perkara yang tidak berfaedah (lagha) seperti melayari facebook, laman-laman web yang tidak bermanfaat dsb., yang akan merosakkan minda kita sepanjang hari itu.

6. Bagi pelajar non-Muslim, berdoa/sembahyanglah waktu pagi, sekurang-kurangnya 10 minit luangkan waktu mengingati Tuhan. Juga jangan tidur pada waktu pagi, dan bersedia awal untuk ke kelas, lain-lain sama seperti no 5 di atas.

7. Jika boleh, ambillah masa 10-15 minit untuk tidur pada waktu tengah hari (sebelum zuhur) atau selepas zuhur, kerana ia boleh menyegarkan minda kita pada waktu awal malam. Ingat, bukan 2 jam ok.

8. Sebelum keluar bilik/rumah, semaklah barang-barang yang perlu dibawa ke kelas, supaya tidak tertinggal nota kuliah atau peralatan lain yang diperlukan semasa kuliah. Mana-mana barang yang tertinggal akan menjejaskan mood kita ketika menghadapi kuliah tersebut.

9. Mengambil sarapan pagi yang sesuai diperlukan untuk membolehkan kita belajar dengan selesa dan bertahan hingga waktu tengah hari. Jangan tinggalkan sarapan pagi. Elakkan makan nasi lemak atau mana-mana makanan yang melebih 500 kalori. Atau anda boleh melihat jadual waktu anda dan mencari waktu sesuai untuk makan. Cuma jangan masuk kuliah dalam keadaan kelaparan (atau terlalu kekenyangan), kerana ia boleh menjejaskan tumpuan anda, oleh itu rancanglah waktu dan bersedialah lebih awal. Jika berpuasa pastikan kita mengambil sahur yang secukupnya di waktu akhir.

10. Berikan tumpuan sepenuhnya sewaktu di dalam kelas, anggaplah ia adalah waktu-waktu yang sangat berharga dalam hidup kita, hargai pensyarah dengan menghayati kelasnya.

11. Jika menghadapi sebarang masalah dengan kuliah atau tugasan, selesaikan segera dengan pensyarah, jangan tangguhkan, sebarang penangguhan mungkin menyebabkan anda terlupa, atau kemudiannya berasa malas untuk bertanya.

12. Pakailah pakaian yang selesa ke kelas selain mengikut garis panduan yang telah ditetapkan oleh pihak universiti. Pakaian yang tidak selesa seperti seluar terlalu ketat, atau tudung yang memaksa kita membetulkan beberapa kali, atau pakaian sendat, akan mengganggu tumpuan kita. Dalam kata lain, pakaian kita tidak menyebabkan kita berasa serba salah atau malu berada di depan kelas ketika membuat pembentangan atau tugasan lain.

IMAM ASY-SYAFIE

Disediakan oleh

MOHD KHAIRUL NIZAM BIN AG. HASBOLAH
MUHAMAD ARIFF BIN MAHMUD
MOHD. MARZUKI BIN AMAT @ SABI

PENDAHULUAN

Imam Muhammad bin Idris asy-Syafi’i atau dikenali sebagai Imam asy-Syafi’i merupakan seorang tokoh Islam yang mempunyai nama yang cukup besar dalam menghulurkan sumbangan dan kemaslahatan (kebaikan) terutama dalam bidang ilmu pengetahuan dan pendidikan kepada seluruh umat Islam. Ketinggian ilmunya melebihi pujian yang diucapkan kepadanya. Penguasaan ilmu pengetahuannya yang bersumberkan kepada rujukan al-Quranul karim dan Sunnah Nabi amat disegani oleh pihak kawan mahupun lawan. Beliau telah menghabiskan sisa hidupnya dengan menimba pelbagai ilmu pengetahuan untuk ditaburkan kembali dalam tarbiyah (pendidikan) dan pembangunan masyarakat. Tidak dapat dinafikan, beliau merupakan qudwatun hasanah (ikutan atau tauladan yang baik) sebagai ulama mulia yang memperjuangkan mazhab ahlus-Sunnah wal-Jamaah. Beliau juga telah mengangkat martabat Islam ke makam (kedudukan) yang terpuji di sisi Allah S.W.T. Sesungguhnya, kehebatan Imam asy-Syafi’i amat menonjol dan tersohor sebagai seorang pelopor dan perumus pertama metodologi hukum Islam mengikut furuk (cabang) ilmu pengetahuan. Ushul fiqh (metodologi hukum Islam) ‘lahir’ setelah Imam Syafi’i menulis karya-karyanya yang begitu hebat dan amat menakjubkan dalam dunia keilmuan Islam dan Barat. Pada masa kini, Mazhab Syafi’i telahpun diikuti, diamalkan dan dijadikan panduan serta pedoman oleh 28% umat Islam seluruh dunia. Malah, merupakan mazhab yang kedua terbesar pengikutnya setelah Mazhab Hanafi.

BAB 1

1. RIWAYAT HIDUP IMAM ASY-SYAFI’I
Imam asy-Syafi’i dilahirkan pada tahun 150H dan hidup dalam keadaan yatim di bumi Gaza, Palestin. Beliau telah hafaz 30 juzu’ al-Quran ketika masih muda iaitu sebelum umurnya tujuh tahun lagi. Ibunya telah membawa beliau ke Hijaz, sebuah tempat yang berhampiran dengan kota Mekah. Beliau hidup dalam keadaan yang sangat miskin. Tetapi Allah S.W.T telah melimpahkan kurnia ke atas dirinya berupa nikmat kecerdikan dan kepintaran, di samping seorang ibu yang sangat prihatin dalam mengasuh beliau setiap masa tanpa mengenal erti penat dan lelah.

1.1 Nama dan Nasab (keturunan)
Nama penuh Imam asy-Syafi’i ialah Muhammad bin Idris bin al-Abbas bin Uthman bin Syafi’ bin as-Sa’ib bin Ubaid bin Abd Yazid bin Hasyim bin al-Muthalib bin Abd. Manaf. Nasab beliau bertemu dengan nasab Nabi Muhammad S.A.W pada datuknya yang bernama Abd. Manaf bin Qusoi kerana baginda ialah Muhammad bin Abdullah bin Abd. Muthalib bin Hasyim bin Abd. Manaf.

1.2 Kelahiran dan Zaman Kanak-Kanak (150H hingga 173H)
Menurut Umar Muhammad Noor (2013), daripada Abu Abdullah al-Hakim an-Naisaburi, beliau ada berkata, “Saya tidak pernah menemukan sebarang perselisihan antara murid-murid Imam asy-Syafi’i bahawa beliau dilahirkan pada tahun 150H iaitu tahun wafatnya Abu Hanifah.”
Menurut Umar lagi yang dipetik daripada riwayat Imam al-Baihaqi, ayah Imam asy-Syafi’i yang bernama Idris, mereka telah bermusafir ke Syam untuk berniaga. Beliau membawa isterinya bersama dalam perjalanan tersebut. Apabila tiba di Asqalan (Palestin), isterinya melahirkan anak lelaki yang diberi nama Muhammad. Keluarga ini menetap di negeri tersebut hanya dua tahun sahaja. Setelah si ayah meninggal dunia, ibunya telah membawa anak yang masih kecil itu kepada keluarga mereka di kota Mekah. Berkenaan dengan cerita ini, menurut Umar (2013), Imam asy-Syafi’i pernah berkata, “Aku dilahirkan di Gaza pada tahun 150H, kemudian aku dibawa ke Mekah ketika berusia dua tahun.”
Di kota Mekah, Muhammad bin Idris hanyalah seorang anak yatim yang miskin. Namun begitu, beliau sangat bijak dan cerdas. Apabila beliau dibawa ke kuttab untuk belajar, ibunya tidak mampu membayar yuran pengajian yang ditetapkan oleh pihak sekolah. Namun, kerana kecerdasan Imam as-Syafi’i, ia tidak dikenakan sebarang yuran untuk belajar. Malah, suatu ketika gurunya itu meminta Imam asy-Syafi’i pula menggantikan beliau agar dapat mengajar rakan-rakannya itu. Sesungguhnya, Imam asy-Syafi’i benar-benar menghargai jasa gurunya itu dan telah mengambil peluang keemasan dengan belajar besungguh-sungguh dengan memperbanyakkan membaca, menulis dan menghafaz 30 Juzu’ al-Quran tanpa menghiraukan masa untuk bermain seperti kanak-kanak yang lain.
Menurut Umar (2013), Imam asy-Syafi’i ada berkata, “Setelah selesai menghafaz al-Quran, aku datang ke masjid dan duduk bersama dengan para ulama untuk menghafaz Hadis atau masalah-masalah Fiqh (cabang ilmu Ibadah atau Feqah). Ibuku tidak memiliki wang untuk membeli buku, maka aku mengumpulkan tulang-tulang haiwan untuk dijadikan tempat catatanku. Jika telah penuh, aku lemparkannya ke dalam sebuah bakul, sehingga terkumpul di rumahku dua bakul besar berisi tulang-temulang.”
Selain gemar belajar, Imam asy-Syafi’i juga menyukai seni memanah. Menurut Umar (2013, Amr bin Sawad telah meriwayatkan daripada Imam asy-Syafi’i bahawa ia berkata,” Aku sangat mencintai dua perkara iaitu memanah dan menuntut ilmu. Kemahiranku dalam memanah, aku tepat menembak dalam sepuluh daripada sepuluh sasaran.” Amr berkata lagi, asy-Syafi’i tidak menjelaskan kemahirannya dalam ilmu. Maka aku berkata, Demi Allah, kemahiranmu dalam ilmu itu melebihi kemahiranmu dalam memanah.”

1.3 Latar Pendidikan Imam Asy-Syafi’i
Sedari kecil Imam asy-Syafi’i sangat berminat untuk menuntut ilmu pengetahuan. Beliau begitu cemerlang dalam dunia pendidikan sejak zaman kanak-kanak lagi. Beliau amat tekun, berdisiplin dan amat disenangi oleh setiap guru yang pernah mengajar dirinya. Beliau tidak pernah mengeluh dan berasa bosan untuk menimba sebanyak mungkin ilmu pengetahuan daripada pelbagai guru yang beliau temui. Berikut ialah perjalanan mengikut masa dalam latar pendidikan Imam as-Syafi’i sepanjang kehidupan beliau.

1.3.1 Penguasaan Bahasa Arab dan Fiqh
Setelah mencapai usia baligh, Imam asy-Syafi’i telah mengunjungi suku Huzail di luar Kota Mekah untuk mempelajari ilmu-ilmu yang berkaitan dengan bahasa Arab. Beliau memilih suku Huzail kerana mereka terkenal dengan kehalusan bahasa dan sasteranya yang tinggi. Imam asy-Syafi’i gemar menggelarkan suku Huzail itu sebagai suku Arab yang paling fasih.
Menurut Imam An-Nawawi, Imam asy-Syafi’i telah menghabiskan masa selama 20 tahun untuk mendalami bahasa dan sastera Arab. Pembelajaran dalam jangka masa ini telah berjaya mengasah kehalusan budi dan ketelitian Imam asy-Syafi’i dalam ilmu bahasa dan sastera. Ilmu-ilmu yang beliau peroleh ketika itu, sangat membantu beliau dalam kajian al-Quran dan al-Hadis yang beliau pelopori. Sekali gus, membantunya dalam perbahasan ilmiah dengan kata-kata yang mudah difahami oleh orang ramai.
Beliau terus mendalami bahasa dan sastera Arab sambil menghafal pelbagai syair Arab sehingga beliau benar-benar menguasai ilmu tersebut. Beliau tidak beralih kepada ilmu Fiqh sehingga berlakunya suatu kejadian yang menyentuh kesedaran dirinya sendiri.
Menurut Umar (2013, Mush’ab bin Abdullah az-Zubairi ada berkata, “As-Syafi’i pada awalnya seorang pemuda yang sangat gemar dengan syair, sejarah dan sastera. Kemudian, ia beralih kepada Fiqh kerana suatu kejadian”. Pada suatu hari, ia menaiki kenderaannya sambil mendendangkan syair-syair Arab. Kebetulan pembantu peribadi ayahku ada bersamanya. Beliau lalu memukul asy-Syafi’i dengan cambuknya dan berkata, ”Orang sepertimu rela menjual maruahmu demi syair? Mengapa engkau tidak sahaja mempelajari ilmu Fiqh?”
Kejadian itu telah menyedarkan Imam asy-Syafi’i, betapa pentingnya ilmu Fiqh itu untuk dikuasai oleh seseorang yang amat dahagakan ilmu pengetahuan. Beliau lalu mendatangi majlis az-Zinji yang merupakan mufti Mekah pada ketika itu untuk belajar ilmu Fiqh. Tidak lama kemudian, beliau telah pergi ke kota Madinah untuk belajar pula daripada Imam Malik bagi mendalami lagi ilmu tersebut.

1.3.2 Guru-guru di Kota Mekah
Kejadian tersebut benar-benar mengubah cara hidup Imam asy-Syafi’i. Beliau segera mengunjungi para ulama di Kota Mekah untuk menimba ilmu pengetahuan daripada mereka. Ketika beliau berada di Kota Mekah, beliau selalu hadir di majlis Sufyan bin Uyainah. Sufyan bin Uyainah merupakan seorang tokoh besar ahli Hadis di Kota Mekah, sebesar Imam Malik di Madinah. Hubungan Imam asy-Syafi’i dengan Ibnu Uyainah terjalin sangat erat lebih daripada sekadar hubungan seorang guru dengan murid. Kedua-duanya saling mengagumi antara satu sama lain. Menurut Umar (2013), Imam asy-Syaf’i ada berkata, “Aku belum pernah melihat seorang yang telah cukup dalam dirinya semua syarat fatwa namun sangat enggan berfatwa selain Sufyan bin Uyainah. Aku juga tidak melihat orang yang lebih pandai dalam Tafsir selain daripadanya.”
Setiap kali Ibnu Uyainah ditanya tentang Fiqh, beliau menunjuk ke arah Imam asy-Syafi’i sambil berkata, “Tanyalah kepada dia.”
Selain tokoh-tokoh yang telah disebutkan, Imam asy-Syafi’i juga telah menuntut ilmu daripada pakar-pakar Hadis dan fiqh kenamaan lainya di Mekah. Antaranya, pakciknya sendiri yakni Muhammad bin Ali bin Syafi’, al-Fudhail bin Iyadh, Abdullah bin Muammal al-Makhzumi, Ismail bin Abdullah bin Qastantin (gurunya di bidang qiraat) dan ramai lagi.
Ketekunan Imam asy-Syafi’i dalam menuntut ilmu membawa hasil yang sangat sempurna. Dengan khazanah Hadis yang dikuasainya, disokong oleh kecerdasan dan kefasihannya, beliau diktiraf untuk berfatwa, padahal beliau belum pun mencapai usia 20 tahun pada masa itu. Menurut Umar (2013), Muslim az-Zinji berkata kepadanya, “berfatwalah, wahai Abu Abdillah. Telah tiba masanya bagimu untuk berfatwa.”

1.3.3 Menuntut ilmu di Kota Madinah (173H hingga 179H)
Kota Madinah pada zaman Imam asy-Syafi’i merupakan sebuah kota gedung ilmu yang cukup terkenal. Imam Malik bin Anas, tokoh Ulama yang paling menguasai ilmu Hadis dan Fiqh telah tinggal di kota tersebut. Nama Imam Malik semakin mashyur selepas beliau menulis kitab al-Muwattha’. Ribuan orang dari pelbagai penjuru dunia terutama dari bumi Mesir dan Afrika utara dan timur telah datang berbondong-bondong datang ke Madinah untuk menghadiri pembacaan kitab ini. Seperti pencinta ilmu lainnya, Imam asy-Syafi’i sangat berminat untuk berjumpa dan belajar daripada Imam Malik. Menurut Umar (2013), Imam as-Syafi’i selalu berkata, ”Tidak ada kitab di muka bumi ini yang lebih sahih daripada al-Muwatta’ oleh Imam Malik.”
Maka, berangkatlah Imam asy-Syafi’i ke Madinah setelah meminjam dan menghafaz kitab al-Muwatta’ daripada seorang rakannya. Az-Zahabi menegaskan bahawa pada saat itu, usia Imam asy-Syafi’i ialah kira-kira 23 tahun.
Imam Malik merupakan seorang ulama yang sangat berwibawa. Beliau tidak pernah membacakan Hadis kepada muridnya, sebaliknya murid yang membacakan Hadis kepada dirinya. Apabila Imam asy-Syafi’i pertama kali berjumpa dengan Imam Malik, beliau segera mengungkapkan keinginannya untuk membaca al-Muwatta’ kepada beliau. Menurut Umar (2013), Imam Malik yang belum mengenal Imam asy-Syafi’i segera berkata, “Carilah seseorang untuk membacakan kitab ini bagimu.”
Imam asy-Syafi’i ada berkata, “Cubalah tuan dengarkan bacaanku ini. Jika tuan tidak menyukainya, aku akan segera mencari orang lain.” Imam Malik segera berkata, “Cubalah engkau membacakannya.”
Imam asy-Syafi’i segera membaca beberapa Hadis daripada kitab tersebut. Setelah mendengarkan bacaannya, Imam Malik sangat menyukai kefasihan beliau. Imam asy-Syafi’i diizinkan untuk membaca al-Muwatta’ sehingga beliau selesai membaca kitab tersebut dalam masa yang singkat. Imam asy-Syafi’i lalu menetap di kota Madinah sehingga Imam Malik wafat pada tahun 179H. Beliau menimba banyak ilmu pengetahuan daripadanya selama tujuh tahun.
Selama jangka waktu tersebut, beliau juga telah belajar daripada ramai ulama di kota Madinah seperti Ibrahim bin Abi Yahya, Abd. al-Aziz bin Muhammad as-Darawardi, Ibrahim bin Sa’ad, Anas bin Iyadh dan ramai lagi.

1.3.4 Hijrah ke Yaman (179H hingga 184H)
Setelah Imam Malik wafat, Imam asy-Syafi’i berhijrah pula ke Yaman bagi mencari nafkah untuk keluarganya yang miskin. Beliau bekerja sebagai salah seorang pembantu tugasan Gabenor Yaman. Menurut Umar 92013), Imam asy-Syafi’i ada bercerita, “Setibanya di Yaman, aku diberikan sebuah tugasan. Aku mendapat pujian di atas pekerjaanku, lalu diserahkan pula pelbagai tugasan yang lain. Para pekerja dari Yaman yang datang ke Mekah pada bulan Rejab seringkali memuji namaku sehingga namaku terkenal di kota Mekah.”
Tugasan yang diamanahkan kepada Imam asy-Syafi’i berkaitan dengan pengurusan hal-ehwal kemasyarakatan seperti mengadili persengketaan, penetapan hak milik dan segala tugas yang berkaitan dengan perkhidmatan awam yang lain. Rahsia kejayaan Imam asy-Syafi’i ialah jiwanya yang menjunjung tinggi keadilan dan kejujuran. Beliau tidak sekali-kali termakan rasuah dan riba dalam melaksanakan kewajipannya itu.
Menurut Umar (2013), Imam asy-Syafi’i ada bercerita, “kemudian aku ditugaskan menjadi wali kota Najran, tempat tinggal Bani Harith dan dan Mawali Tsaqif. Biasanya setiap kali ditugaskan sebagai sorang wali di tempat itu, mereka memberinya rasuah agar ia mengikuti kemahuan mereka. Mereka hendak melakukan itu juga kepada diriku tetapi aku menolaknya bulat-bulat.”
Imam asy-Syafi’i lalu bercerita bahawa rakyat yang selama ini dizalimi segera mendatangi beliau untuk menuntut kembali hak mereka. Dengan hikmah dan kecerdasannya, Imam asy-Syafi’i berjaya menegakkan keadilan meskipun telah menyebabkan kebencian daripada pihak-pihak yang tertentu. Pihak-pihak yang tidak berpuas hati dan membenci Imam asy-Syafi’i itu segera menyusun perancangan jahat untuk menjatuhkan maruah dan menyingkirkan beliau. Mereka mengadu kepada kerajaan Abbasiyah di Baghdad akan adanya pemberontakan Syiah Alawiyah di Yaman. Mereka menulis surat kepada Khalifah Harun ar-Rasyid, Antara pemimpin pemberontak ialah seorang hamba yang bernama Muhammad bin Idris (Imam asy-Syafi’i). Lidahnya lebih berbahaya daripada pedang.”
Tidak lama kemudian, keluarlah perintah daripada Khalifah Harun ar-Rasyid untuk menangkap Imam asy-Syafi’i dan kelompok Syiah Alawiyah lalu membawa mereka ke Baghdad untuk menerima hukuman yang dahsyat.

1.3.5 Kunjungan Pertama ke Kota Baghdad (184H hingga 186H)
Kerajaan Abbasiyah pada saat itu sangat tegas dalam menumpaskan pemberontak Syiah yang kerap mengacau keamanan negara. Kerajaan sangat sensitif kepada setiap orang yang dilabelkan sebagai penganut Syiah. Situasi ini dimanfaatkan oleh musuh-musuh Imam asy-Syafi’i untuk menyingkirkan beliau. Padahal, beliau bukanlah seorang pengikut Syiah, bahkan, beliau tidak sekali-kali bersetuju dengan ajaran Syiah.
Ibnu Katsir ada berkata, “Asy-Syafi’i terlalu terhormat untuk berpendapat seperti mazhab Syiah, kelompok terusir dan hina. Ia sangat cerdas, memiliki kefahaman dan hafalan sempurna serta akal yang jernih.”
Namun, hasad dengki manusia itu sememangnya amat buruk dan kejam. Ia akan membuatkan orang yang tidak bersalah menjadi terhukum dengan hina. Dengan tangan dan kaki terbelenggu, Imam asy-Syafi’i dan puluhan orang Syiah Alawiyah yang dituduh sebagai pemberontak telah dibawa ke kota Baghdad untuk menerima hukuman. Semua ini berlaku pada tahun 184H, ketika itu usia Imam asy-Syafi’i ialah kira-kira 34 tahun.
Namun, kerana kebijaksanaan beliau menghadapi Khalifah Harun ar-Rasyid, beliau segera menyangkal sebarang tuduhan yang dilemparkan ke atasnya. Khalifah Harun ar-Rasyid lantas menyedari kesilapannya kerana telah menangkap Imam asy-Syafi’i yang begitu mengagumkannya. Akhirnya, beliau dibebaskan dengan jaminan keselamatan dan diberikan layanan serta penghormatan dari Amirul Mukminin (Khalifah Harun ar-Rasyid). Di Kota Baghdad beliau berjumpa dengan Muhammad bin al-Hassan asy-Syaibani dan pernah berdebat dalam majlis ilmu. Tidak berapa lama kemudian, Imam asy-Syafi’i pulang ke Kota Mekah sambil membawa kitab-kitab ahli fiqh di kota Baghdad sepenuh unta membawanya.

1.3.6 Kunjungan Kedua ke Kota Baghdad (195H hingga 197H)
Imam asy-Syafi’i kembali berkunjung ke kota Baghdad. Namun, kali ini bukan sebagai tawanan, sebaliknya, beliau datang sebagai Ulama yang terkenal dari Hijaz yang disegani oleh kawan dan pihak lawan. Al-Hasan bin Muhammad az-Za’farani telah berkata, “Asy-Syafi’i datang ke kota kami (Baghdad) pada tahun 195H. Setelah tinggal bersama kami selama dua tahun, ia lalu pergi ke kota Mekah. Ia kembali kepada kami pada tahun 198H dan tinggal beberapa bulan kemudian dan lalu pergi lagi.
Kedatangan Imam asy-Syafi’i pada kali ini ke Iraq menjadi pembuka mata ahli Ra’yi bahawa mazhab ahli Hijaz layak juga diperhitungkan dan diamalkan dalam kehidupan seharian. Selama ini, mereka mengira bahawa fiqh hanya berada di Iraq. Ahli Hijaz di mata mereka tidak lebih daripada sekumpulan ahli Hadis yang tidak menguasai Fiqh dan kaedah Istinbat.

1.3.7 Menetap di Mesir (199/200H hingga 204H)
Imam asy-Syafi’i melanjutkan perjalannya ke Mesir sambil ditemani oleh al-Humaidi dan lain-lain. Menurut Harmalah bin Yahya, mereka tiba di Mesir pada tahun 199H. Namun, ar-Rabi bin Sulaiman mengatakan bahawa kedatangan mereka ke Mesir ialah pada tahun 200H. Imam asy-Syafi’i pernah bertanya kepada ar-Rabi bin Sulaiman sebelum ia pergi ke Mesir, “Bagaimana keadaan ahli Mesir ketika tuan tinggalkan mereka?” Ar-Rabi menjawab, “Mereka terpecah menjadi dua bahagian. Satu bahagian memihak kepada Mazhab Malik dan berjuang membelanya. Satu bahagian pula memihak kepada mazhab Hanifah dan membelanya.”
Imam asy-Syafi’i lantas berkata, “Aku berharap agar dapat datang segera ke Mesir dan memberikan mereka sesuatu perkara yang akan menyatukan mereka daripada kedua-dua mazhab itu.”
Di Mesir, Imam asy-Syafi’i telah berjumpa dengan ramai Ulama, antara lain ialah Yahya bin Hassan at-Tinnisi, seorang ahli Hadis yang berasal dari kota Basrah yang menetap di Mesir. Maka daripada beliau, Imam asy-Syafi’i telah mengambil Hadis-hadis al-Laits bin Sa’ad, juga sebuah buku karangan Asyhab bin Abd. Al-Aziz, murid kepada Imam Malik. Abdul Malik bin Hisyam yang merupakan pakar sejarah dan bahasa Arab di Mesir juga telah datang berjumpa dengannya. Al-Muzani ada menceritakan:
“Ketika asy-Syafi’i datang ke Mesir, Ibnu Hisyam pengarang kitab as-Sirah an-Nabawiyah ada mengunjunginya. Mereka lalu berbincang tentang nasab keturunan para perawi Hadis. Di Kota Mesir, Imam asy-Syafi’i mula menampakkan kritikannya kepada Malik bin Anas setelah beristikharah selama satu tahun. Imam asy-Syafi’i berkata, “Ketika aku tiba di Mesir, aku hanya tahu bahawa Imam Malik menyalahi 16 Hadis. Setelah aku fikirkan kembali, ternyata beliau sering mengambil cabang (furuk) sambil meninggalkan pokok (asal) atau mengambil pokok namun meninggalkan cabang.
Selain itu, faktor lain yang mendorong Imam asy-Syafi’i mengkritik gurunya adalah sikap berlebihan penduduk Andalus (Sepanyol) yang sangat mengagungkan Imam Malik sehingga menolak Hadis Nabi Muhammad S.A.W apabila bertentangan dengan ucapannya. Imam asy-Syafi’i ingin menunjukkan bahawa Imam Malik ialah kalangan manusia biasa yang boleh terkeliru. Lantas, beliau menulis kitab Ikhtilaf Malik wa asy-Syafi’i. Kitab ini telah menyebabkan pengikut Mazhab Maliki di Mesir berasa marah sehingga terjadilah pertikaian yang hampir menyebabkan Imam asy-Syafi’i terusir dari kota Kaherah di Mesir. Walau bagaimanapun, Imam asy-Syafi’i hanya melakukan apa yang wajib beliau lakukan bagi menegakkan kebenaran demi kemaslahatan seluruh umat Islam.
Seperti di kota Baghdad, Imam asy-Syafi’i berjaya menarik pemuda-pemuda Mesir untuk menjadi muridnya. Maka, terkumpullah di sekitarnya orang-orang yang kelak menjadi perawi mazhab jadid (baharu) asy-Syafi’i. Antaranya ialah Abu Ya’qub al-Buwaithi, Harmalah bin Yahya, Abu Ibrahim al-Muzani, Yunus bin Abd. al-A’la, ar-Rabi’ bin Sulaiman, Ahmad bin Soleh, Bahr bin Nasr, Ahmad bin Abd. Rahman bin Wahb dan lain-lain. Mereka selalu menghadiri majlis asy-Syafi’i dan mendengarkan pembacaan buku-buku karangan seperti al-Mabsuth, Ahkam al-Quran, ar-Risalah al-Jadidah, as-Sunan dan sebagainya.
Imam asy-Syafi’i sentiasa menjelaskan bahawa usul mazhabnya adalah mengikuti Hadis Nabi Muhammad S.A.W jika terbukti kesahihannya. Beliau tidak akan meninggalkan Hadis itu kecuali jika ada Hadis lain yang bertentangan dengannya. Beliau juga meninggalkan kata-katanya yang terkenal.
“Jika kamu menemukan dalam kitabku sesuatu yang bertentangan dengan Hadis Rasulullah S.A.W. Maka kamu ambillah Sunnah Nabi Muhammad S.A.W dan tinggalkanlah ucapanku.”

1.3.8 Kewafatan Imam asy-Syafi’i (204H)
Kesihatan Imam asy-Syafi’i tidak mengizinkan, ketika beliau menghabiskan sisa hidupnya di kota Kaherah, Mesir . Ar-Rabi’ ada berkata, “asy-Syafi’i tinggal di Mesir selama empat tahun. Beliau meninggalkan 1500 helai kertas yang berisi ilmu pengetahuan yang amat bernilai. Beliau menulis kitab al-um sebanyak 2000 halaman, kitab as-Sunan dan kitab-kitab lainnya yang sangat banyak dalam tempoh empat tahun tersebut. Padahal ia sedang sakit. Sehingga ketika ia menunggang kuda, darah menitis hingga memenuhi khuf (sepatunya) kerana sakit buasir.”
Yunus bin Abd. al-A’la berkata, “Aku tidak pernah melihat orang yang diuji dengan sakit seberat asy-Syafi’i. Pada suatu hari, aku masuk ke dalam kamarnya, ia lalu berkata kepadaku, “Wahai Abu Musa, bacakan padaku ayat 20-100 daripada Surah ali-Imran dan bacalah dengan tidak terlalu lambat dan tidak pula terlalu cepat.” Aku lalu membacanya mengikut kehendak imam asy-Syafi’i. Setelah selesai membaca, ia berkata kepadaku, “Jangan lupa untuk mendoakanku kerana aku sedang dalam musibah.”
Ar-Rabi bin Sulaiman berkata, “asy-Syafi’i meninggal dunia pada tahun 204H pada hari terakhir bulan Rejab.” Ketika ditanya, berapakah usianya ketika beliau wafat? Ia menjawab, “50 tahun lebih”. Dalam riwayat lain, dikatakan bahawa ia meninggal dunia pada malam jumaat dan dikebumikan pada waktu Asar. Syeikh Ahmad Syakir memperkirakan tahun kewafatan Imam asy-Syafi’i itu bertepatan pada 19 Januari 820M.

BAB 2

2. IMAM ASY-SYAFI’I TOKOH KEILMUAN ISLAM
Imam asy-Syafi’i memiliki sifat mahmudah, akhlak mulia dan sifat terpuji dalam dirinya. Beliau adalah cerminan Hadis-hadis Nabi Muhammad S.A.W dan akhlak para Ulama Salafussoleh. Berikut ialah sifat-sifat mulia yang terdapat dalam diri Imam as-Syafi’i.

2.1 Tokoh Islam Dermawan
Imam asy-Syafi’i terkenal dengan sikap dermawannya. Beliau tidak pernah menyimpan harta tetapi selalu membahagikan harta-hartanya itu kepada setiap orang yang memerlukan. Ini adalah sifat Rasulullah S.A.W dan para Isteri dan sahabat baginda. Sifat pemurah ini sememangnya adalah tanda kenabian dan kesolehan seseorang mukmin. Imam asy-Syafi’i ada berkata;
“Sifat dermawan dan murah hati akan menutupi keaiban seseorang di dunia dan di akhirat selama ia bukan termasuk ahli bidaah (sesat).”

Pada setiap hari, Imam asy-Syafi’i selalu bersedekah mengikut kemampuannya. Ar-Rabi’ pernah berkata, “asy-Syafi’i tidak pernah melalui satu hari tanpa bersedekah. Beliau selalu bersedekah pada malam hari. Pada bulan Ramadhan pula, beliau memperbanyakkan sedekah dengan wang dan pakaian, memberi makan kepada fakir miskin dan orang-orang yang lemah. Beliau sangat prihatin dengan keadaan mereka. Beliau sering bertanya keadaan orang yang beliau kenali lalu memberi bantuan kepada mereka.”

2.2 Penekanan Imam asy-Syafi’i dalam Tarbiyah (Pendidikan)
Imam asy-Syafi’i begitu menekankan aspek tarbiyah dalam kehidupan. Perkara ini dapat dibahagikan kepada tiga perkara. Contohnya adalah seperti berikut.
i. Beliau telah memberikan penekanan dalam menghafal Kitabullah (Al-Quran) dengan hafalan yang tepat lagi sempurna.
ii. Penekanan terhadap bahasa Arab mestilah dengan sentiasa dititikberatkan terutama nahu dan sarafnya (cabang ilmu kesusasteraan bahasa Arab) kerana bahasa Arab merupakan asas dan kunci kepada memahami isi kandungan al-Quranul Karim dan as-Sunnah Nabi. Seseorang hamba Allah itu atau pelajar tidak akan dapat memahami apa yang dimaksudkan oleh firman Allah S.W.T dan sabda Nabi Muhammad S.A.W kecuali dengan menguasai bahasa Arab dengan baik dan berusaha untuk memahami isi kandungannya dengan teliti.
iii. Imam asy-Syafi’i sentiasa memberi penekanan kepada Sunnah Nabi. Ini membuatkan beliau telah menghafal dengan sempurna kitab al-Muwattha’ (karangan Imam Malik) di kota Makkah sebelum beliau mencapai umur 20 tahun lagi. Kemudian, barulah beliau bermusafir ke Madinah untuk bertemu dengan Imam Malik.

2.3 Kemahiran dalam Ilmu Pengetahuan
Kemahiran Imam asy-Syafi’i dalam ilmu pengetahuan Islam tidak perlu diragukan lagi oleh para ulama pelosok dunia. Beliau amat diakui telah mencapai darjat Ijtihad yang memungkinkan dirinya mengeluarkan hukum daripada al-Quranul Karim dan as-Sunnah Nabi tanpa terikat dengan pendapat orang lain. Berikut ialah sebahagian daripada kepakaran Imam asy-Syafi’i dalam al-Quran, ilmu Hadis dan aqidah atau tauhid.

2.3.1 Ilmu al-Quran dan Tafsir
Menurut Imam asy-Syafi’i, al-Quran ialah nama tersendiri. Kata ini bukan berasal daripada “qara’a” yang bermakna membaca. Beliau berkata, “jika al-Quran berasal daripada “qara’a” nescaya, semua kitab yang boleh dibaca ialah al-Quran. Akan tetapi Ia merupakan nama yang diberikan kepada al-Quran sebagaimana nama kitab Taurat, Zabur dan Injil.

2.3.2 Sanad Imam asy-Syafi’i dalam al-Quran
Imam asy-Syafi’i sentiasa membaca al-Quran dengan sanad yang bersambung hingga kepada Nabi Muhammad S.A.W. Beliau menerimanya daripada Ismail bin Abdillah, Syibl bin Abbad, Abdullah bin Kathir, Mujahid, Ibnu Abbas, Ubay bin Ka’ab seterusnya daripada Nabi Muhammad S.A.W yang menerima wahyu melalui perantara Malaikat Jibril A.S.

2.4 Dasar-Dasar Mazhab Imam asy-Syafi’i
Dasar-dasar Mazhab Syafi’i dapat dilihat dalam kitab ushul fiqh ar-Risalah dan kitab fiqh al-Umm. Di dalam kitab tersebut, Imam Syafi’i menjelaskan beberapa kerangka dan prinsip mazhabnya serta beberapa contoh dalam merumuskan hukum far’iyyah (yang bersifat cabang) dalam hukum-hukum Islam yang muktabar. Dasar-dasar mazhab asy-Syafi’i bertunjangkan kepada empat prinsip yang utama seperti berikut.
i. Al-Quran merupakan panduan agung yang menjadi rujukan pertama Imam asy-Syafi’i dalam penekanan segala hukum dalam menyelesaikan segala permasalahan harian. Al-Quran adalah pedoman yang terkandung di dalamnya segala cabang-cabang ilmu daripada Allah S.W.T sebagai cahaya kehidupan umat Islam dan seluruh manusia.
ii. Sunnah dari Rasulullah S.A.W kemudian akan digunakan jika tidak ditemukan sebarang rujukan dari isi kandungan kitab al-Quran. Segala perkataan, perbuatan, amalan dan nasihat daripada Nabi Muhammad S.A.W akan dijadikan rujukan selama baginda masih hidup. Sesungguhnya, Imam asy-Syafi’i sangat kuat pembelaannya terhadap Sunnah Nabi sehingga mendapat jolokan Nashir As-Sunnah (pembela Sunnah Nabi) oleh para ulama Islam.
iii. Ijma’ Ulama ialah kesepakatan daripada para sahabat Nabi sendiri yang tidak terdapat sebarang perbezaan pendapat dalam menyelesaikan sesuatu masalah. Ijma’ Ulama yang diterima oleh Imam asy-Syafi’i adalah berdasarkan keseragaman ulama dalam memutuskan dan menjatuhkan sesuatu hukum dengan bijak dan adil.
iv. Qiyas yang terdapat dalam ar-Risalah disebut sebagai ijtihad, iaitu apabila ijma’ Ulama tidak juga menemukan sebarang jawapan bagi menyelesaikan sesuatu masalah atau hukum. Maka, istilah Qiyas atau kiasan iaitu mirip kepada perkara yang terjadi dalam peredaran masa lalu dan perbandingan pada masa kini. Contohnya, seperti penyalahgunaan najis dadah. Dadah itu dikiaskan sebagai racun yang boleh membunuh jika ia disalahgunakan. Hukumnya adalah haram jika disalahgunakan kerana ia akan memudaratkan sehingga membawa kematian ke atas diri seseorang. Akan tetapi Imam Syafi’i menolak dasar istihsan dan istislah sebagai salah satu cara menetapkan hukum Islam.

BAB 3

3. PERBANDINGAN HUKUM MAZHAB IMAM ASY-SYAFI’I

1. Makruh menggunakan air musyammas dalam bersuci. Air musyammas ialah air yang dipanaskan di bawah sinar matahari di dalam bekas yang diperbuat daripada logam sehingga mengeluarkan buih.

Mazhab Hanafi, Maliki dan Hambali – Hukumnya harus dan tidak makruh.

2. Dua qullah adalah kadar pembeza antara air sedikit dan banyak.
Mazhab Hambali menyetujui pendapat ini. Mazhab Hanafi dan Maliki juga menyetujui Mazhab Hambali dengan menyatakan, dua qullah bukan pembatas antara kedua-duanya.

3. Makruh bersiwak (memberus gigi) untuk orang yang berpuasa setelah tergelincinya matahari.
Mazhab Hanafi, Maliki dan Hambali- Hukumnya tidak makruh.

4. Khatan wajib bagi lelaki dan perempuan. Mazhab Maliki dan Mazhab Hanafi menyatakan, khatan itu sunat sahaja. Mazhab Hambali pula menyatakan, khatan itu wajib bagi lelaki dan sunat bagi perempuan.

5. Cukup mengusap sedikit sahaja bahagian kepala dalam berwudhuk walaupun sehelai rambut. Mazhab Maliki menyatakan, wajib mengusap keseluruhan kepala dalam berwudhuk. Mazhab Hanafi pula menyatakan, mesti mengusap sepertiga atau seperempat kepala. Terdapat dua riwayat daripada Mazhab Hambali, Salah satunya seperti pendapat Mazhab Syafi’i yang lain seperti pendapat Mazhab Maliki.

6. Sunat mengusap kepala tiga kali dalam berwudhuk seperti anggota yang lain.
Mazhab Hanafi, Maliki dan Hambali – Cukup satu kali sahaja.

7. Batal wuduk jika menyentuh perempuan yang bukan mahram. Mazhab Maliki menyatakan, tidak batal jika tanpa syahwat. Mazhab Hanafi pula menyatakan, tidak batal kecuali jimak. Manakala Mazhab Hambali pula menyatakan, terdapat tiga riwayat khusus berkenaan hukum tersebut.

8. Wajib mandi kerana keluar mani meskipun tanpa syahwat.
Mazhab Hanafi, Maliki dan Hambali – Tidak wajib mandi jika tidak diiringi dengan syahwat.

9. Bagi orang yang memiliki balutan luka di tubuhnya, wajib membasuh bahagian di tubuhnya yang sihat dalam wudhuk dan mandi, lalu bertayamum untuk bahagian yang luka. Mazhab Maliki menyatakan, hendaklah dibasuh anggota wudhuk yang sihat, diusap di atas balutan luka dan tidak perlu bertayamum. Mazhab Hanafi pula, jika bahagian yang sihat lebih banyak, cukup dibasuh bahagian tersebut sahaja. Manakala Mazhab Hambali tidak perlu diusap atas balutan ataupun bertayamum.

10. Menunaikan solat Isyak pada awal waktu lebih baik daripada akhir waktu.
Mazhab Hanafi, Maliki dan Hambali – Menunda solat Isyak itu adalah lebih baik.

11. Basmalah mestilah dibaca dengan jahar (kuat) pada solat-solat jahriah. Mazhab Hanafi dan Mazhab Hambali menyatakan, hendaklah dibaca dengan perlahan. Mazhab Maliki pula tidak perlu dibaca langsung.

12. Makmum wajib membaca Surah al-Fatihah dalam Solat berjemaah di belakang Imam dalam semua Solat.
Mazhab Hanafi, Maliki dan Hambali – Tidak wajib membaca al-Fatihah dalam Solat berjemaah bagi makmum di belakang Imam.

13. Berselawat kepada Nabi Muhammad S.A.W dalam tasyahud akhir adalah wajib.
Mazhab Hanafi, Maliki dan Hambali – Tidak wajib.

14. Sunat dilakukan doa qunut ketika Solat Subuh setelah bangkit daripada rukuk pada rakaat kedua. Mazhab Maliki berpendapat, sunat dilakukan doa qunut ketika Solat Subuh sebelum rukuk. Mazhab Hanafi dan Mazhab Hambali pula menyatakan doa qunut hanya dilakukan ketika solat witir sahaja.

15. Sujud Sahwi hukumnya sunat, jika ditinggalkan tidak mengapa. Mazhab Hanafi dan Mazhab Hambali pula menyatakan hukumnya adalah wajib. Mazhab Maliki pula menyatakan adalah wajib jika kerana kekurangan. Namun, hukumnya sunat jika bukan kerana itu.

16. Seorang makmum yang melakukan Solat Fardhu di belakang Imam yang melakukan Solat Sunat, maka solat kedua-duanya adalah sah.
Mazhab Hanafi, Maliki dan Hambali – Tidak sah.

17. Boleh jamak Solat Zohor dan Asar atau Maghrib dan Isyak secara berjemaah dalam hujan lebat. Mazhab Maliki dan Mazhab Hambali berpendapat, boleh hanya untuk Solat Maghrib dan Isyak sahaja. Mazhab Hanafi pula berpendapat, tidak boleh langsung untuk semua solat ini.

18. Sunat bertakbir sambil mengangkat tangan dalam Solat Sunat Hari Raya sebanyak tujuh kali pada rakaat pertama dan lima kali pada rakaat kedua. Mazhab Maliki dan Mazhab Hambali berpendapat, rakaat pertama sebanyak enam kali, rakaat kedua pula sebanyak lima kali. Mazhab Hanafi pula menyatakan, memadai hanya tiga kali sahaja pada kedua-dua rakaat Solat Sunat Hari Raya.

19. Sunat dilaksanakan Solat Sunat Hari Raya di Masjid. Jika ia terlalu sempit untuk semua orang, bolehlah diadakan Solat berjemaah di tanah lapang.
Mazhab Hanafi, Maliki dan Hambali – Sunat dilaksanakan di tanah lapang kecuali hujan dan seumpamanya.

20. Sunat berkhutbah dua kali setelah Solat Istisqa (minta hujan) dan gerhana.
Mazhab Hanafi, Maliki dan Hambali – Bukan sunat.

21. Boleh dilaksanakan Solat gerhana meskipun berlaku pada masa-masa terlarang untuk Solat.
Mazhab Hanafi, Maliki dan Hambali – Tidak perlu Solat, namun cukup bertasbih dan berzikir.

3.1 Prinsip Imam Asy-Syafi’i dalam Tarbiyah (Pendidikan)
Perkara Pertama yang seringkali diingatkan oleh Imam asy-Syafi’i ialah kita sebagai umat Islam hendaklah sentiasa berpegang teguh dengan ajaran Islam yang bersumberkan intipati al-Quran dan as–Sunnah dan tidak menolak satu pun daripadanya dalam apa juga bentuk takwil (mengubah maksud). Beliau sangat menekankan, supaya kita sentiasa merujuk kepada as-Sunnah sebagai rujukan atau panduan selepas al-Quran dalam kehidupan seharian. Beliau memerintahkan umat Islam supaya jangan berselisih faham di antara satu sama lain. Imam asy-Syafi’i ada berkata, “Sekiranya hadis itu sahih maka itulah mazhabku.” Beliau berkata lagi, “Apabila kamu dapati kata-kataku bercanggah dengan Hadis Nabi Muhammad S.A.W. Maka, hendaklah kamu mencampakkan kata-kataku itu ke dinding.”
Sesungguhnya, Imam asy-Syafi’i turut menyatakan, “Aku beriman kepada Allah dengan apa yang diturunkan oleh Allah berdasarkan apa yang dikehendaki oleh Allah. Aku juga beriman dengan Rasulullah dan apa yang dibawakan oleh Rasulullah mengikut apa yang dikehendaki oleh Rasulullah S.A.W.” Demikian juga termasuklah dalam apa yang sangat penting dan ditekankan oleh beliau termasuklah prinsip yang berpegang dengan Hadis-hadis ahad dalam aqidah Islam. Imam Al-Syafi’i tidak akan menolak Hadis dengan apa juga takwil ataupun penyimpangan. Bahkan, beliau berpegang dengan zahir nas, sejajar dengan zahir nas itu yang yang difahami oleh generasi Salafus Soleh.

Perkara Kedua pula ialah ia tidak bercanggah dengan al-Quran atau Sunnah Nabi dengan hujah akal. Beliau menyatakan, “Seperti pandangan mata ada had dan batasnya, begitu jugalah dengan akal manusia itu memiliki had dan batasnya.” Maka, di sisi ahlus Sunnah wal- Jamaah, nas al-Quran dan As-Sunnah sama sekali tidak akan bercanggah dengan akal manusia yang sihat dan waras. Adapun perselisihan itu berlaku jika antara keduanya muncul ilmu kalam yang tidak menjadikan al-Quran dan as-Sunnah itu sebagai hujah dan panduan pendidikan. Sebaliknya, mereka menjadikan falsafah dan akal sebagai hujah semata-mata.

Seterusnya, Perkara Ketiga ialah penekanan terhadap perkataan atau pemahaman para sahabat Radhiyallahu Anhum. Imam Asy-Syafi’i sangat menjunjung tinggi kedudukan para sahabat Nabi Muhammad S.A.W. Beliau telah menghimpunkan banyak atsar ataupun kata-kata para Sahabat dan juga salaf di dalam buku-buku karangan beliau. Beliau mengatakan, “Sesungguhnya para sahabat itu lebih mendahului kita kepada kebaikan berbanding kita, dan kefahaman mereka lebih baik daripada kefahaman kita.” Inilah perkara utama yang menjadikan ijmak Ulama Salaf sepanjang zaman, berbeza dengan Ahli Bid’ah yang hanya mengagungkan Syeikh-syeikh tertentu sahaja tanpa mengetahui latar belakang mereka.

Seterusnya, Perkara Keempat ialah menjauhi bid’ah dan ahli bid’ah. Imam asy-Syafi’i sangat membenci bid’ah dan juga orang-orang bid’ah. Beliau selamanya tidak akan duduk bersama mereka kecuali kerana darurat atau untuk mengajarkan mereka berkenaan ajaran Islam. Ini kerana beliau risau kalau terpengaruh dengan kesesatan mereka. Maka, menjauhi golongan bid’ah ini menjadi satu penawar buat kita dari terkesan dengan penyakit mereka. Apabila beliau melihat ahli bid’ah, beliau akan berkata, “Sama ada kamu berbincang dengan kami dengan cara yang baik atau kamu beredar sahaja.”

Manakala Perkara Kelima ialah Mencintai sesama saudara Islam serta menjaga sillaturrahim sesama mereka. Imam asy-Syafi’i sanggup menggadaikan hartanya pada jalan Allah untuk membantu kaum Muslimin, dan bersabar di dalam menanggung kemiskinan dan kesusahan. Beliau juga bersabar terhadap kezaliman pemerintah yang sering tidak berlaku adil terhadap dirinya. Inilah antara prinsip-prinsip penting dan utama yang menjadi pegangan Imam Asy-Syafi’i dalam mengembangkan syiar Islam dan mengangkat dunia Pendidikan atau ilmu pengetahuan bersumberkan ajaran Islam yang syumul.

3.2 Sumbangan Besar Imam asy-Syafi’i dalam Pendidikan
Mengikut kitab al-Umm yang ditemui pada masa sekarang, ada juga yang dicetakkan bersama kitab-kitabnya yang lain dalam satu kitab al-Umm, di antaranya adalah:
i. ar-Risalah, mengandungi huraian sumber hukum Islam, serta kaedah-kaedah pengistinbatan hukum syarak.
ii. Khilaf Malik, mengandungi bantahan-bantahan asy-Syafi‘i terhadap beberapa pendapat gurunya iaitu Imam Malik.
iii. ar-Radd ‘Ala Muhammad ibn Hasan, mengandungi pembelaan asy-Syafi’i terhadap mazhab ulama Madinah dari serangan Imam Muhammad ibn Hasan, murid Imam Abu Hanifah.
iv. al-Khilaf ‘Ali wa Ibn Mas’ud, iaitu kitab yang memuatkan perbezaan pendapat antara Imam Abu Hanifah dan ulama Kota Bagdhad dengan Ali bin Abi Thalib dan Abdullah bin Mas’ud.
v. Sair al-Auza’i, berisi pembelaannya atas Imam al-Auza’i dari serangan Imam Abu Yusuf.
vi. Ikhtilaf al-Hadith, berisi keterangan dan penjelasan Imam asy-Syafi‘i ke atas hadith-hadith yang tampak bertentangan.
vii. Jima’ al-‘Ilmi, berisi pembelaan Imam asy-Syafi’i terhadap Sunnah Nabi Muhammad S.A.W.

PENUTUP / KESIMPULAN

Sesungguhnya, sumbangan besar dan jasa bakti Imam asy-Syafi’i dalam dunia pendidikan Islam tidak perlu dipertikaikan lagi. Beliau telah menjadi pemangkin kepada empat Mazhab ahlus Sunnah wal-Jamaah yang diakui sebagai ikutan al-Quranul Karim dan Sunnah Nabi Muhammad S.A.W yang sohih di sisi Islam. Pada masa kini, kita seringkali dimomokkan dengan pelbagai kecenderungan ajaran bida’ah, syiah, dan sebagainya yang mungkin tanpa kita sedari telah meresapi amalan kehidupan kita seharian. Kita sebagai umat Islam hendaklah sedar dan berwaspada. Malah, kembali merujuk ajaran Imam asy-Syafi’i sesuai dengan panduan dan pedoman yang lengkap sebagai ilmu pengetahuan yang menyelamatkan kita dalam mengharungi kehidupan di dunia dan di akhirat kelak. Segala anasir dan paksi kejahatan hendaklah kita tangkis dengan rujukan yang mantap berasaskan ajaran dalam Mazhab asy-Syafi’i yang kita ikuti di negara Malaysia yang tercinta ini. Marilah kita bersama-sama menyedekahkan Surah al-Fatihah ke atas Junjungan Besar Nabi Muhammad S.A.W, para sahabat, keluarga baginda dan khususnya kepada Imam asy-Syafi’i Rodhi Allahu Anha.

SENARAI RUJUKAN

Hamid, Mohd. Liki, 2006. Pengajian Tamadun Islam, ed. Ke-2, Kuala Lumpur: PTS Profesional.

Umar Muhammad Noor, 2013. Mengenali Imam Asy-Syafi’i Seorang Pejuang Sunnah. Kuala Lumpur: Telaga Biru Sdn Bhd.

LAMPIRAN

imam syafie
Gambar 1.1 menunjukkan gambaran wajah Imam asy-Syafi’i.

peta mazhab
Peta 1.1 menunjukkan Mazhab Syafi’i (warna Biru tua) dominan di Afrika Timur, di sebahagian Jazirah Arab dan Asia Tenggara.

kitab risalah
Gambar 1.2 menunjukkan Kitab Ar-Risalah oleh Imam asy-Syafi’i yang diterjemahkan ke dalam Bahasa Melayu oleh Dr. Muhammad Amar Adly.

masjid syafie
Gambar 1.3 menunjukkan gambar Masjid Imam asy-Syafi’i di Kaherah, Mesir.

.makam syafie
Gambar 1.4 menunjukkan gambar di dalam Makam Imam asy-Syafi’i di Kaherah, Mesir.

kitab al-umm
Gambar 1.5 menunjukkan gambar Kitab al-UmM oleh Imam asy-Syafi’i yang telah dijilidkan dan diterbitkan untuk rujukan Umat Islam seluruh dunia.

Pengenalan Pengurusan Islam

DISEDIAKAN OLEH:

FARIDAH BINTI JAIR

NURAFIQAH BINTI MOHD TAIP

DEFINISI UMUM PENGURUSAN

Pengurusan menurut takrif popular dan ringkas yang diberikan oleh Mary Parker Follet adalah disifatkan sebagai seni melakukan perkara tertentu untuk tujuan tertentu melalui orang-orang lain.[1]  Walau bagaimanapun, menurut definisi Anderson yang lebih lengkap, ada tiga takrif yang boleh difahami daripada istilah pengurusan iaitu pengurusan bermaksud pengurus atau pekerja sesebuah organisasi yang bertanggungjawab untuk mengatur atau merancang urusan organisasi dalam lingkungan polisi dan kehendak organisasi atau institusi perniagaan pekerja tersebut.  Beliau juga mengistilahkannya sebagai pengurusan sesebuah syarikat berhad dianggotai oleh lembaga pengarah.[2]  Ahli lembaga pula dianggotai oleh ahli yang mempunyai jawatan eksekutif dalam syarikat tersebut serta ahli bukan eksekutif .Selain itu, L. D. White pula mendefinisikan pengurusan sebagai  menyelaraskan tenaga kerja untuk mencapai matlamat negara.  Menurut Muhd. A. Al-Buraey pula pengurusan bermaksud menyelaraskan tenaga manusia sebagai makhluk sosial yang perlu berinteraksi antara satu sama lain.[3]  Tambahan lagi, Ahmad Ibrahim Abu Sin mengistilahkannya sebagai  suatu kajian ilmiah/kesenian terhadap bakat kebolehan serta kemahiran seseorang menjadi pengurus.    Seperkara lagi, beliau mendefinisikan hal ini sebagai aktiviti mengurus sumber dan tugas untuk mencapai objektif yang telah ditentukan.  Akhir sekali, Taji, sarjana India mendefinisikan pengurusan sebagai melaksanakan perintah dan menyelaraskan kegiatan bersama kelompok.

 

DEFINISI UMUM PENTADBIRAN

Pentadbiran menurut Berkley, Rouse dan Begovich, mengandungi tiga elemen penting iaitu manusia, tindakan tugas dan interaksi antara dua orang atau lebih.  Pendapat Anderson yang selari dengan mereka di mana fungsi dan tanggungjawab pentadbir atau pengurus lebih diberi keutamaan untuk mengatur segala urusan perniagaan.[4]  Dalam rangka yang agak selari juga, Abdul Rahim dan Shahrul Bariah berpendapat bahawa pentadbiran adalah lebih melibatkan fungsi yang telah dipersetujui dan ditetapkan.  Di samping itu, Gladden pula mengistilahkan sebagai mengurus dan mengawas manusia untuk menyelesaikan masalah atau pekerjaan.  H. G. Federickson  mentakrifkan pentadbiran sebagai mentadbir negara secara sistematik untuk tujuan kebajikan dan memenuhi keperluan social.[5]

 

PERBEZAAN ANTARA PENGURUSAN DAN PENTADBIRAN

Orientasi Pentadbiran lebih mementingkan fungsi dan tanggungjawab pentadbiran manakala orientasi pengurusan lebih menekankan perjawatan, kekuasaan dan matlamat keuntungan.  Proses membuat keputusandalam pentadbiranitu dicapai melalui keputusan dalam pentadbiran itu dicapai melalui keputusan bersama sesebuah jawatankuasa manakala dalam pengurusan, proses membuat keputusan bergantung kepada hierarki sesebuah institusi korporat.  Tambahan lagi, pentadbiran ialah perlaksanaan tidak melibatkan perubahan dasar, pengurusan sebaliknya. Pentadbiran tidak terlibat dalam membuat keputusan, pengurusan menentukan keputusan. Pengurusan merupakan penyelarasan tenaga manusia, sistem perlaksaan dan penyelarasan untuk mencapai matlamat organisasi.

 

DEFINISI PENGURUSAN DAN PENTADBIRAN DARI PERSPEKTIF ISLAM

Kitab suci Al-Quran ada menyebut tentang pengurusan dan pentadbiran.  Hal ini dapat dijelaskan melalui ayat-ayat berikut:

Sesungguhnya Tuhan kamu ialah Allah yang menciptakan langit dan bumi dalam enam msa, kemudian Dia bersemayam di atas ‘Arasy (singgahsana) untuk mengatur segala urusanSurah Yunus (10):2

Allah mengatur segala urusan (makhluk-Nya), menjelaskan segala tanda kebesaran-Nya, supaya kamu meyakini pertemuan dengan TuhanmuSurah Ar-Ra’d (13) :2

Allah mengatur segala urusan dari langit ke bumi, kemudian urusan itu naik kepada-Nya dalam satu hari yang kadarnya adalah seribu tahun menurut perhitunganmuSurah As-Sajdah (32) : 5

 “Tanyalah kepada mereka (yang musyrik itu) : Siapakah yang memberikan rezeki kepada kamu dari langit dan bumi? Atau siapakah yang menguasai pendengaran dan penglihatan? Dan siapakah yang  mengeluarkan makhluk yang hidup dari benda yang mati dan mengeluarkan benda yang mati dari makhluk yang hidup? Dan siapakah pula yang mentadbir urusan sekalian alam? (Dengan pertanyaanpertanyaan tersebut) maka mereka yang musyrik itu tetap akan menjawab (mengakui) dengan berkata :  Allah jugalah yang menguasai segala-galanya. Oleh itu

katakanlah : Jika kamu mengakui yang demikian,  mengapa kamu tidak mahu bertaqwa?” Surah Al-Yunus : 31

 

 HIERARKI KEUTAMAAN PENGURUSAN

Hierarki pertama dalam hierarki keutamaan dalam pengurusan adalah Dharuriyyatt.  Dharuriyyatt merupakan urusan yang amat penting yang tanpanya manusia tidak mencapai kebahagiaan ukhrawi.  Selain itu, hal ini juga merujuk kepada segala yang diperlukan untuk mewujudkan dan meneruskan kehidupan. Sekiranya kepentingan ini tidak dapat dipenuhi maka akan berlakunya kepincangan dalam kehidupan.  Hak-hak yang perlu dipelihara termasuklah Din (Agama), jiwa, akal, keturunan dan harta benda.

Seperkara lagi, hierarki yang kedua pula ialah Hajiyyatt.  Hajiyyatt ialah keperluan manusia, ia menghilangkan kesulitan serta  memudahkan mu’amalat.  Di samping itu, hal ini membawa  erti yang sama dengan maksud segala nilai yang diperlukan oleh manusia untuk mendatangkan kemudahan dan menghindarkan kesukaran dalam kehidupan mereka.

Akhir sekali, hierarki yang ketiga ialah Tahsiniyyat.  Tahsiniyyat merujuk kepada nilai yang diperlukan untuk menjadikan kehidupan lebih selesa.  Segala benda yang ada di muka bumi ini yang mendatangkan keselesaan dalam kehidupan manusia.

 

FUNGSI PENGURUSAN

Fungsi pengurusan dalam kehidupan ialah merancang.  Pengurusan memutuskan apa yang perlu berlaku pada masa hadapan dan mencipta rancangan untuk dilaksanakan.  Merancang juga menentukan tujuan dan perencanaan merupakan perkara pokok dalam pengurusan.  Daya intelek yang dilengkapkan pada manusia oleh Allah S.W.T. akan melahirkan pelbagai cara dan idea untuk menentukan tujuan dan perancangan dalam pengurusan.  Segala yang dirancang hendaklah bersumberkan Al-Quran dan Al-Hadith.

Selain itu, pengurusan juga berfungsi untuk mengatur .  Kaedah mengatur yang baik dengan menggunakan sumber-sumber yang diperlukan secara optimum untuk membolehkan rancangan dilaksanakan dengan berjaya.

Tambahan lagi, pengurusan juga berfungsi sebagai memimpin atau memotivasi.  Secara amnya, hal ini menonjolkan kemahiran dalam bidang-bidang kepimpinan dan motivasi untuk memastikan orang lain memainkan peranan yang berkesan dalam pencapaian rancangan.  Oleh itu, semua perkara atau tugasan dapat diselesaikan mahupun dicapai dengan tepat dan berhasil.

Seperkara lagi, mengawal dan mengawas juga merupakan fungsi pengurusan.  Dalam mengurus sesuatu perkara, kita akan memeriksa dan membandingkan kemajuan yang sebenar dengan rancangan, serta mengubah suai rancangan tersebut berdasarkan maklum balas.  Pengawalan diperintahkan ke atas orang Islam dengan cara pengawasan diri dan nasihat-menasihati.  Sesungguhnya Allah SWT sentiasa mengikuti dan mengawasi segala apa yang tersurat dan tersirat di dalam kelakuan manusia.

Firman Allah S.W.T. bermaksud : “ Sesungguhnya Allah sentiasa menjaga dan mengawasi kamu”. (Al Nisa’:1)

 

CIRI-CIRI UMUM PENGURUSAN ISLAM

Ciri-ciri umum bagi pengurusan Islam ialah mempunyai wawasan yang jauh.  Pengurusan Islam yang berwawasan jauh dan tinggi dengan sentiasa melakukan yang terbaik dalam mengurus apa juga urusan  agar dapat mencapai kemajuan di dunia dan mendapat keredhaan di akhirat kelak.

Tambahan lagi, ikatan yang erat antara pengurusan dengan mesyarakat.  Ikatan itu ialah akhlak, nilai masyarakat dan perubahan masyarakat yang berasaskan akhlak.  Seterusnya, pengurus mengadakan perancangan jangkamasa panjang yang menggariskan hala cara operasi sesebuah organisasi, menyusun pekerjanya untuk menjalankan tugas dengan cekap, mengagih, mengawal, merangsang motivasi dan tugas kepada semua pekerja di bawahnya agar objektif dan matlamat organisasi boleh dicapai.

Di samping itu, ikatan yang erat antara pengurus dan kakitangan serta masyarakat.  Sekiranya pengurusan dalam sesuatu organisasi itu baik dan cemerlang, hubungan silaturahim antara pengurus dan kakitangannya serta masyarakat akan intim dan terhindar dari sebarang konflik.

Firman Allah S.W.T. bermaksud :  “ Sesungguhnya orang-orang mukmin adalah bersaudara….”. (Al Hujurat:10)

 Dan berpeganglah kamu semua kepada tali (agama) Allah, dan janganlah kamu berpecah belah..”. ( Al Imran:103)

Tambahan lagi, pergolakan dan perubahan ekonomi yang memberikan kepuasan iaitu dari segi fisiologi, individu, ekonomi dan kebendaan.  Pengurusan yang berhasil akan membawa kesan yang positif kepada individu di mana seseorang itu dapat mencapai kegemilangan dalam hidup.  Dari segi ekonomi pula pastinya kestabilan ekonomi negara akan berada dalam tahap yang memuaskan.

Seperkara lagi, pengurusan Islam menekankan nilai kemanusiaan dan kerohanian.  Sebarang kezaliman sama sekali tidak diterapkan dalam pengurusan Islam.  Sebagai contoh, dalam sebuah syarikat, ibadah wajib dalam Islam amat ditekankan dan diberi kelonggaran dalam melaksanakan kewajipan dan tuntutan agama dalam kehidupan seharian seperti menunaikan solat walaupun dalam waktu bekerja.

Akhir sekali, menentukan tugas dan tanggungjawab.  Setiap mukmin adalah dituntut untuk melakukan amal soleh sama ada untuk kepentingan individu, orang ramai atau sesuatu organisasi.  Apabila berada dalam konteks organisasi, pengurus selaku pemimpin bertanggungjawab untuk menentukan tugas-tugas kepada pekerja-pekerjanya.  Islam memandang kerja sebagai tanggungjawab dan tanggungjawab ini terletak pada orang yang diamanahkan kerja, yang kemudiannya bertanggungjawab pula kepada manusia dan Allah S.W.T. terhadap apa yang dikerjakan.

 

CIRI-CIRI KHUSUS PENGURUSAN ISLAM

Ciri-ciri khusus pengurusan Islam yang pertama ialahm Mentauhidkan Allah S.W.T iaitu bukan setakat menolak segala tuhan yang lain dalam apa bentuk sekalipun, tetapi menerima dengan penuh yakin tentang kebesaran, kekuasaan, kekayaan, kemuliaan Allah S.W.T.

Ciri khusus kedua ialah sikap bekerjasama.  Kerjasama hendaklah diberikan kepada kedua-dua pihak, pihak yang memerintah dan pihak yang diperintah dan kerjasama dalam perkara-perkara yang baik sahaja. Sifat kerjasama berhubung rapat dengan sifat pengasih. Orang tidak pengasih terhadap sesama manusia dianggap sebagai orang yang tidak akan mendapat perhatian dari Allah S.W.T.

Seterusnya, ciri khusus pengurusan Islam ialah menerapkan kebenaran dalam pengurusan.

Di samping itu, hal ini turut menerapkan keadilan dalam mengurus sesuatu iaitu meletakkan sesuatu (amanat) itu pada yang berhak menerimanya.

Tambahan lagi, melaksanakan syura.  Allah SWT telah mewajibkan umat Islam mengadakan permesyuaratan sesame mereka sebelum melakukan sesuatu pekerjaan kecil atau besar khususnya di dalam hal pengurusan.  Hal ini merupakan satu penghormatan yang berharga kepada nilai kemanusiaan itu sendiri.  Ia sebenarnya merupakan satu pendekatan untuk kestabilan, keutuhan dan keharmonia seluruh umat Islam.

Firman Allah S.W.T. bermaksud :

 “ Segala urusan mereka hendaklah diputuskan dengan asas perundingan”. (Al Syura:38) Prinsip ‘syura’ dalam Islam ialah melakukan tinjauan fikiran orang yang terlibat dalam sesuatu perancangan untuk mengelakkan rasa ketidakpuasan yang mungkin berlaku.

Seperkara lagi, menerapkan nilai Ihsan .Ihsan bermaksud berbuat kebajikan, melakukan sesuatu dengan cara yang terbaik atau cemerlang dan mengenal pasti kelemahan untuk membaikinya dan bukan untuk mencacinya.[6]

 

TIGA NILAI PENTING DALAM PENGURUSAN (KEBENARAN, KEADILAN, DAN IHSAN)

Pengurusan yang dibawa oleh Islam melalui ajaran al-Quran dan dihayati oleh Rasulullah s.a.w serta diamalkan pula oleh pengganti baginda khususnya khulafa’ al-Rashidin adalah penumpuan kepada manusia yang dibentuk berasaskan Tauhid.

Tauhid atau mengesakan Allah S.W.T itu bukan setakat menolak segala tuhan yang lain dalam apa bentuk sekalipun, tetapi menerima dengan penuh yakin tentang Kebesaran, Kekuasaan, Kekayaan, Kemuliaan Allah S.W.T serta segala sifatNya yang lain bagi menginsafi bahawa manusia itu adalah hamba yang sangat kerdil yang tidak mempunyai apa-apa kecuali dengan izinNya.  Sehubungan itu, segala urusan di dunia ini hendaklah dilaksanakan dengan sebaiknya di samping meletakkan Allah S.W.T sebagai tujuan segala urusan dan memasang niat bahawa segala pengurusan yang dijalankan  adalah kerana-Nya.

Oleh itu, pengurusan perlu dilaksanakan dalam maksud melaksanakan suatu tanggungjawab yang berat yang diamanahkan kepada kita berdasarkan Tauhid yang bercirikan oleh kebenaran, keadilan dan ihsan.  Hal ini merupakan nilai yang akan menggerakkan manusia supaya tidak melakukan sebarang kezaliman, termasuk kezaliman di atas diri sendiri iaitu dengan melakukan sebarang kemungkaran.

 

Kebenaran merupakan sebab tunggal mengapa alam semesta ini dicipta.

Dan tidaklah Kami ciptakan langit dan bumi dan apa yang ada di antara keduanya, kecuali untuk kebenaran …’’ Surah al-Hijr(15): 85

Jikalau segala ciptaan adalah atas asas kebenaran, maka manusia yang tergolong dalam penciptaan ini juga harus menegakkan kebenaran.  Oleh itu tentulah kebenaran ini menuntut supaya pengurusan itu dilaksanakan atas kebenaran juga.  Implikasinya ialah, segala fakta yang dikemukakan haruslah benar.  Harus wujud keterbukaan atau ketulusan dalam pengurusan, tidak ada orang yang harus menolak kebenaran walaupun menjejaskan kedudukan atau perasaan mereka.  Segala perkaraharus diteliti dengan halus supaya kebenaran akan timbul, dan bukan boleh diselindung atau “disapu di bawah tikar”.  Kebenaran harus dituntut atau dicari walaupun ia akan memakan masa, belanja, atau tenaga yang banyak.

Al Quran menyenaraikan dua sifat utama berhubung dengan etika perniagaan dalam Islam iaitu adil dan ihsan.

Firman Allah S.W.T. bermaksud : “ Sesungguhnya Allah menyuruh (kamu) berlaku adil dan berbuat kebajikan”. ( An Nahl:90)

Seterusnya ialah nilai keadilan.  Adil dari segi bahasa ialah meletakkan sesuatu ke tempat asalnya.

Dalam pengurusan, nilai adil adalah sesuatu yang wajib diterapkan dalam setiap insan kerana seseorang  yang mengurus sesuatu perkara tanpa bersikap adil maka pelbagai musibah mahupun bencana pasti akan melanda.

Sesungguhnya Allah menyuruh kamu menyampaikan amanat kepada yang berhak menerimanya, dan (menyuruh kamu) apabila menetapkan hukum di antara manusia supaya kamu menetapkan dengan adil.  Sesungguhnya Allah memberi pengajaran yang sebaik-baiknya kepadamu.  Sesungguhnya Allah adalah Maha Mendengar lagi Maha Mengetahui.”

Surah an-Nisa (4): 58

Takrif adil yang diberi oleh Allah seperti yang tersebut dalam maksud ayat di atas ialah meletakkan sesuatu (amanat) itu pada yang berhak menerimanya adalah suatu takrif yang begitu luas, termasuk dalam melantik manusia ke jawatan tertentu, menghukum, mengagih harta atau sesuatu yang patut diagihkan seperti tugas dan tanggungjawab, dan sebagainya.  Adil juga membawa erti melakukan sesuatu itu pada peringkat yang paling minimum.

Ihsan pula bermaksud melakukan sesuatu yang lebih dari taraf adil.  Selain itu, ihsan juga bermaksud mengenalpasti kelemahan untuk membaikinya dan bukan untuk mencacinya.  Ihsan bukan sahaja bermaksud melakukan sesuat dengan cara yang terbaik atau cemerlang.  Bahkan ihsan menuntut supaya segala yang dilakukan itu harus melebihi dari taraf yang ditetapkan atau taraf adil.  Ini merupakan suatu rangsangan kepada kita untuk sentiasa mencari jalan bagaimana meningkatkan setiap usaha yang kita lakukan bagi mencapai kecemerlangan.  Pengurusan yang melaksanakan ihsan ini akan sentiasa mencari kebaikan orang dan bukan keburukan atau kelemahan orang.

 

PENGURUSAN BARAT DAN JEPUN

BARAT

Pengurusan di barat sangat mementingkan nilai individualisme dan kebebasan hidup individu.

Selain itu, nilai kepimpinan berasaskan profesional juga dilaksanakan oleh mereka.  Kepimpinan menggalakkan kepada perkembangan inisiatif dan kreativiti individu serta  memberi penumpuan kepada perhubungan tugas dalam organisasi.  Akhir sekali, barat mengamalkan pengurusan mengikut objektif tugas organisasi.[7]

 

JEPUN

Pengurusan Jepun pula mementingkan kejayaan kelompok atau berkumpulan. Mereka juga berkepimpinan bercirikan masyarakat pekerja dan juga kepimpinan memberi penumpuan kepada pembinaan kekuatan kumpulan.  Tambahan lagi, negara Jepun sangat memberi penumpuan kepada perhubungan kemanusiaan di kalangan pekerja malahan pengurusan secara muafakat dan persetujuan bersama diamalkan.[8]

Antara Sarjana Islam Mutakhir

Syed Abul Hasan Ali Hasani Nadwi

Syed Abul Hasan Ali Hasani Nadwi merupakan salah seorang sarjana Islam. Beliau dilahirkan pada 23 November  1914.  Tempat lahir beliau ialah di Takia Kala, Rae Berily, India.  Nama sebenar beliau ialah Ali bin Abdul Hayy bin Fakhruddin bin Aliy al-Hasani.  Beliau merupakan bekas pelajar perubatan graduan di Universiti Lucknow.  Antara karya agung sepanjang hidup beliau ialah “Apakah kerugian dunia akibat kemunduran umat Islam.

Sarjana pemikir Barat

 Peter Ferdinand Drucker

Belia dilahirkan pada 19 November 1909 di Kaasgraben, Vienna, Austria.  Beliau merupakan seorang penulis yang mana bukunya sering menulis tentang bagaimana pengurusan manusia pada setiap sektor masyarakat, perniagaan, dan pemerintah.  Antara karya terbaik beliau ialah “Reflections of a Social Ecologist” [9]

John C. Maxwell

John C. Maxwell dilahirkan di Garden City, Michigan pada 1947.  Graduan Ijazah Sarjana Muda di Universiti Ohio Christian pada 1969.  Antara karya terbaik beliau ialah “There’s No Such Thing as Business Ethics (There’s Only ONE RULE for Making Decisions).”

 

Jurji Zaydan Antara sarjana Islam mutakhir adalah Jurji Zaydan.  Tarikh lahir beliau ialah 14 Disember 1861.   Beliau dilahirkan di Beirut.   Antara karya teragung yang ditulis sepanjang hidup beliau ialah al-Hilal.

Sumber Pengurusan Islam

Sumber Primer

Al-Quran

Al-Quran merupakan sumber utama dalam aspek pengurusan Islam.  Ianya menjadi sumber rujukan yang paling penting dan utama.  Hal ini adalah kerana kebenarannya yang telah terbukti.  Al-Quran merupakan kitab Allah yang mengandungi ajaran yang syumul untuk kemashlahatan seluruh umat manusia.  Terdapat ayat-ayat dan peraturan yang berkaitan dengan tatacara kehidupan bermasyarakat yang mencangkupi pelbagai bidang seperti ekonomi, politik, sosial dan pendidikan termasuklah pengurusan. Al-Quran merupakan salah satu mukjizat Rasulullah S.A.W.  Al-Quran diturunkan melalui perantaraan malaikat Jibril.  Al-Quran diturunkan di Mekah dan Madinah. Bahasa Al-Quran ialah bahasa Arab kerana nabi Muhammad S.A.W berbangsa arab Quraisy Mekah.  Nabi Muhammad S.A.W dipilih sebagai rasul ketika berumur 40 tahun.  Al-Quran mengandungi 30 juzuk serta 666 ayat.  Menekankan nilai kebenaran, keadilan dan ihsan.

As-Sunnah (Hadith)

Sumber primer yang kedua ialah Sunnah Rasulullah S.A.W. juga dikenali sebagai Hadis.  Hadis ditakrifkan sebagai perbuatan, pengakuan dan perkataan Nabi Muhammad s.a.w.   Baginda bukan sahaja model sahsiah bagi umat Islam bahkan beliau juga merupakan pentadbir, pemimpin dan ahli strategis yang cukup unggul. Hadis tidak bersifat ketinggalan zaman. Ianya sesuai digunakan dalam menjawab segala persoalan yang tidak dijelaskan dalam Al-Quran.  Pentadbiran Rasulullah s.a.w. mudah (tidak canggih) mengikut keadaan dan persekitaran pada masa itu. Hadis Nabi yang kerap didengari diriwayatkan oleh Bukhari Muslim dan Tarmizi Ahmad.  Salah satu faktor mengapa kita perlu mengikuti sunnah Nabi adalah kerana sikap, sifat atau tingkah lakunya yang berakhlak mulia yang harus dicontohi.  Selain itu, baginda juga mempunyai hati yang suci murni.  Baginda tidak pernah melakukan maksiat serta dosa.  Walaubagaimanapun, baginda tetap menunaikan ibadah tidak kira wajib atau sunat.  Baginda bersifat suci murni kerana hati baginda sudah dibersih serta disucikan menggunakan air zam zam oleh malaikat semasa malam peristiwa Isra’ dan Mi’raj.

Sumber sekunder

Para sahabat Rasulullah S.A.W  (khulafa Ar-Rasyidin)

Khalifah Ar-Rasyidin ialah empat orang sahabat Rasulullah yang memimpin kerajaan Islam setelah kewafatan Rasulullah.  Mereka ialah Saidina Abu Bakar As-Siddiq, Umar Al-Khattab, Ali bin Abi Talib dan Uthman bin Affan.  Pemerintahan mereka adalah selama 29 tahun.  Sepanjang pemerintahan mereka, mereka telah banyak membuat perubahan serta kemajuan kepada wilayah-wilayah Islam dibawah pimpinan mereka.  Sistem pengurusan mereka hendaklah dicontohi kerana begitu cekap dan teratur.  Khulafa ar-Rasyidin yang pertama ialah Saidina Abu Bakar As-Siddiq iaitu selama 2 tahun.  Antara cara pengurusan beliau yang patut dicontohi ialah mengirim tentera ke Qudha‘ah dan Abna di Syria serta mempertahankan Madinah daripada ancaman Parsi dan Rom Timur.  Beliau juga berjasa dalam menghapuskan gerakan nabi-nabi palsu.  Khalifah yang kedua ialah Saidina Umar Al-Khattab merupakan yang paling terserlah dan terkenal.  Pentadbirannya telah dianggap mendahului zamannya.  Contohnya, melakukan polisi baru untuk golongan Dzimmi iaitu dengan mengadakan cukai tanah & jizyah.  Dengan itu, taraf dan hak awam diberikan sama rata. Selain itu, beliau juga telah menubuhkan jabatan seperti jabatan tentera, polis, dan percukaian.  Penubuhan Jabatan Kehakiman dan dilantik hakim bergaji bulanan.  Seterusnya ialah Saidina Uthman bin Affan.  Pimpinan beliau adalah selama 12 tahun.  Ciri-ciri pimpinan beliau ialah banyak melakukan perluasan kuasa dan berjaya menakluki Cyprus, Afghanistan, Samarqand, Libya, Algeria, Tunisia, Morocco dan beberapa buah negara lagi.  Khulafa ar-Rasyidin yang terakhir ialah Saidina Ali bin Abi Talib.  Antara kepimpinan beliau ialah menubuhkan pasukan tentera berjalan kaki.  Ciri pengurusan kepimpinan khulafa ar-Rasyidin amatlah sesuai dijadikan sebagai aras panduan dan contoh kepimpinan kita.

 

Ilmuan Pengurusan Islam

Pemikiran klasikal beberapa ilmuan islam yang telah menulis dan mengkaji tentang ilmu pentadbiran dan kepimpinan.  Antaranya ialah Ibnu Khaldun (Muqadimmah), Abu Yusuf (Kitab al-Kharaj) dan Al-Mawardi (Al-Ahkam as-Sultaniyyah).  Kitab Ibnu Khaldun iaitu Muqadimmah menjelaskan perihal mendalam tentang falsafah sejarah, sains sosial dalam sosiologi, demografi dan ekonomi.  Selain itu, Muqaddimah juga menjelaskan tentang teori politik dalam Islam.  Beliau menulis buku ini pada 1377 dan merupakan buku tulisannya yang pertama.  Seterusnya ialah kitab Al-Kharaj iaitu tulisan Abu Yusuf yang sebenarnya ditulis atas arahan Khalifah Harun Al-Rasyid.  Kitab Al-Kharaj membicarakan tentang pemikiran ekonomi Islam.  Kemudian Imam Al-Mawardi.  Kitab beliau kitab Al-Ahkam As-Sultaniyyah menjelaskan tentang proses kerja kerajaan Islam dan teori keberkesanan sistem pengurusan kerajaan Islam.  Mengapa kita perlu mengambil perhatian akan cara pengurusan para ilmuan pemikir Islam? Kerana sudut pandangan mereka dari semua segi telah mereka titikberatkan dalam semua aspek pengurusan.  Mereka telah jauh memandang dan mendalami pengalaman semasa pemerintahan besar kerajaan Islam.

 

Pemikiran atau tulisan ilmuan kontemporari Islam

Menggunakan konsep Ijtihad dan Ijmak dalam Islam.  Pintu Ijtihad tidak boleh ditutup kerana ia akan menyebabkan kemunduran dan menggelapkan masa depan. Definisi Ijtihad itu sendiri ialah usaha seseorang mujtahid dalam mengerah segala kemampuan yang ada untuk memperolehi hokum syarak yang berkaitan dengan perbuatan mukallaf melalui cara yang ditetapkan oleh syarak.  Melalui kekuatan ijtihad sahaja kita akan mampu menelurkan idea-idea besar untuk mempersiapkan ummah ini menghadapi cabaran-cabaran rencam pada masa depan.  Ijmak pula diertikan sebagai konsensus atau kesepakatan pendapat di kalangan golongan ulama dan umat seluruhnya mengenai sesuatu perkara.

Pemikiran dari para ilmuan dari barat atau timur

Para pemikir bukan islam telah membina satu disiplin ilmu pengurusan yang begitu luas dan mantap.[10]  Kejayaan umat islam dahulu pada zaman kegemilangan mereka sebahagiannya adalah berpunca daripada kebijaksanaan golongan ilmuan Islam itu meminjam idea-idea dari tamadun Yunani serta Parsi dan menyesuaikannya dengan falsafah atau prinsip-prinsip Islam.

Objektif pengurusan Islam

Melaksanakan undang-undang Islam dalam semua bidang kehidupan.  Agama selalunya ditafsirkan sebagai sistem kepercayaan dan ibadah.  Namun, Islam diertikan sebagai suatu sistem kehidupan yang mencakupi semua bidang seperti falsafah, undang-undang, ekonomi dan sosial.  Seseorang yang telah terpesong jalannya hendaklah kembali ke pangkal jalan bak kata pepatah ‘sesat di hujung jalan, kembali ke pangkal jalan.’  Pangkal jalan pengurusan pentadbiran yang benar boleh kita contohi ialah pada zaman pimpinan Rasulullah S.A.W dan Khulafa Ar-Rasyidin.  Perlaksanaan kepimpinan mereka sangat telus mengikut Al-Quran dan Sunnah sebagai sumber rujukan utama.  Tiada rasuah, pertumpahan dari sesama kaum yang terjadi pada masa itu.

Kemudian, memakmurkan bumi Allah S.W.T.  Kita sebagai manusia hanyalah menumpang sahaja di bumi ciptaan Allah ini sepatutnya bersyukur akan nikmat ini.  Salah satu cara kita mensyukuri bumi Allah ini ialah dengan menjaganya dengan aman.  Elak berlakunya pertumpahan dari sesama manusia.  Kita juga digalakkan menggali isi alam ini dan meneroka hasil-hasil bumi agar dapat dijadikan manfaat sesama kita.

Di samping itu, melaksanakan tugas sebagai khalifah Allah S.W.T dengan mengurus secara adil dan saksama.  Firman Allah yang bermaksud:  Allah menjadikan orang yang beriman dan beramal soleh dari kalangan kamu (wahai umat Muhammad) bahawa Dia akan menjadiakan mereka khalifah-khalifah yang berkuasa dan Dia akan menguatkan dan mengembangkan agama mereka (agama Islam) yang telah diredhaiNya untuk mereka; dan Dia juga akan mengantikan bagi mereka keamanan setelah mereka mengalami ketakutan (dari ancaman musuh).  Mereka terus beribadat kepadaKu dengan tidak mempersekutukan sesuatu yang lain dengan-Ku dan (ingatlah) sesiapa yang kufur dan ingkar sesudah itu, maka mereka itulah orang yang derhaka.  Seiring dengan itu, pengurusan pentadbiran yang adil oleh Rasulullah dan Khulafa ar-Rasyidin menyebabkan kawasan di bawah pimpinan mereka berada dalam keadaan makmur dan sejahtera.

Membentuk masyarakat yang adil dan berwibawa.  Jika corak kepimpinan sesebuah masyarakat itu dalam keadilan dan berwibawa, maka rakyatnya juga turut mencontohi akan corak kepimpinan yang murni itu.  Bidang pengurusan akan berjalan dengan lancar.  Berlakunya persefahaman dan rakyat yang berbilang kaum serta agama juga akan mudah bersatu.

Objektif pengurusan Islam dalam konteks organisasi

Perkhidmatan berkualiti.  Jika sistem pengurusan organisasi mengikut syariat Islam maka akan mudahlah untuk pekerja dalam sesebuah organisasi itu menghasilkan kerja yang berkualiti dan efektif.  Selain itu, kecekapan dan kecemerlangan pentadbiran juga akan berlaku kerana telah mengutamakan Islam dalam segala hal.

Objektif pengurusan Islam (khas)

Maqasid Syariah ialah memelihara segala nilai-nilai yang diperlukan oleh manusia.  Antara ciri-ciri Maqasid Syariah ialah menjaga akidah.  Akidah bermaksud kepercayaan serta keimanan kepada Allah yang satu yang maha Esa.  Jika terpesong akidah seseorang manusia itu, maka hendaklah kembali ke pangkal jalan.   Akidah merupakan elemen yang penting dalam diri setiap individu.   Kemudian, yang kedua ialah menjaga harta.  Harta merupakan sumber rezeki serta nikmat yang membantu kita dalam meneruskan kehidupan.  Tanpa harta, kita tidak akan dapat memenuhi keperluan hidup pada masa kini.  Jika keperluan hidup kita tiada, maka sukar untuk kita meneruskan kehidupan.  Firman Allah mengenai harta yang bermaksud:  “Kami bahagikan antara mereka segala keperluan hidup mereka dalam kehidupan dunia ini, (setengahnya Kami jadikan kaya raya dan setengahnya miskin menderita); dan juga Kami telah menjadikan darjat setengah mereka tertinggi dari darjat setengahnya yang lain; (semuanya itu) supaya sebahagian dari mereka senang mendapat kemudahan menjalankan kehidupannya dari (bantuan) setengahnya yang lain.  Dan lagi rahmat Tuhanmu (yang meliputi kebahagiaan dunia dan akhirat) adalah lebih baik dari kebendaan dan keduniaan semata-mata yang mereka kumpulkan.” (surah Az-Zukhruf: ayat 32).  Ketiga, melindungi nyawa.  Nyawa adalah penting untuk setiap manusia di muka bumi ini.  Tanpa nyawa manusia tersebut telah dianggap mati.  Nyawa adalah amanah yang Allah beri kepada kita untuk kita jaga.  Namun, setiap yang hidup pasti akan mati.  Jika Allah hendak mencabut nyawa seseorang, maka akan hilanglah nyawa seseorang itu.  Tamatlah riwayat hidupnya dan yang tinggal hanyalah amal ibadahnya. Seterusnya, melindungi akal.  Akal hendaklah kita lindungi kerana manusia tanpa akal adalah manusia yang bodoh dan Allah juga berfirman yang bermaksud: “Dan mengapa mereka tidak memikirkan tentang (kejadian) diri mereka? Allah tidak menjadikan langit dan bumi dan apa yang ada diantara keduanya melainkan dengan (tujuan) benar dan waktu yang telah ditentukan, dan sesungguhnya kebanyakan diantara manusia benar-benar ingkar akan pertemuan dengan Tuhannya.” (Surah Ar-Rum).  Tanpa akal kita tidak akan dapat membezakan yang baik dan yang buruk kerana tiada akal fikiran untuk berfikir perkara logik. Terakhir, menjaga keturunan.  Menjaga keturunan contohnya menjaga nama baik keluarga.  Oleh itu setiap tindak laku kita hendaklah berfikir sebelum melakukan kerana ianya akan memberi impak kepada keluarga kita.

 

 Kesimpulan

Kesimpulannya, pengurusan dan pentadbiran adalah dua perkara yang sama tapi membawa maksud yang berbeza dan aspek yang berbeza.  Pentadbiran merupakan sebahagian daripada pengurusan.  Manakala, pengurusan lebih umum daripada pentadbiran.  Pengurusan ialah kemahiran dalam melaksanakan semua fungsi pengurusan untuk mencapai objektif tertentu yang telah ditetapkan.  Kewujudan organisasi sebagai penggerak dan penyelaras utama sama ada yang berkaitan dengan urusan dalaman atau luaran.  Perihal pengurus yang semestinya adil dan saksama.  Selain itu, adalah juga penting untuk kita menitikberatkan sumber-sumber yang digunakan dalam aspek pengurusan.  Sumber utama yang digunakan dalam pengurusan atau juga disebut sebagai sumber primer ialah Al-Quran dan Sunnah.  Al-Quran dan Sunnah merupakan sumber utama dalam menyelesaikan kemashlahatan yang berlaku dalam bidang pengurusan.  Seterusnya ialah sumber sekunder.  Sumber sekunder ialah sumber yang kedua yang digunakan sebagai rujukan.  Antara sumber sekunder ialah para sahabat Rasulullah S.A.W (Khulafa Ar-Rasyidin), Ilmuan pengurusan Islam, pemikiran atau tulisan para ilmuan kontemporari Islam dan pemikiran dari para ilmuan dari Barat dan Timur.  Kemudian, objektif dalam pengurusan ialah melaksanakan undang-undang Islam dalam semua bidang kehidupan manusia, memakmurkan bumi Allah, disamping melaksanakan tugas sebagai khalifah Allah dengan adil dan saksama.

Sabda Rasulullah S.A.W:  “Katakanlah yang Hak (benar) walau kadang menyakitkan.” [11]Disini jelaslah bahawa berkata benarlah dalam apa jua bicara sekalipun ia menyakitkan kerana pembohongan itu tidak akan tersimpan selama-lamanya, suatu hari kebenaran pasti akan terungkai.

RUJUKAN

Buku

Pengurusan dan Pentadbiran:  Mencapai kecemerlangan melalui penghayatan nilai, 1998.  Kuala Lumpur:  Institut Kefahaman Islam Malaysia (IKIM).

 

Mengurus Secara Islam, 1991.  Kuala Lumpur:  Percetakan Zafar Sdn. Bhd.

 

Pengurusan Dalam Islam, 1991.  Selangor:  Percetakan Dewan Bahasa dan Pustaka.

 

Pengurusan Islam Abad Ke 21, 1996.  Kuala Lumpur:  TINGGI PRESS Sdn. Bhd.

 

Pengurusan Islam, 1994.  Kuala Lumpur:  TINGGI PRESS Sdn. Bhd.

 

Internet

 

Peter F. Drucker Management Expert, Author and Teacher.  (2013).  Dari  www.cgu.edu.

Muhammad Imaduddin.  (2012).  10 Mac 2012, dari www.ustazimad.com .

 


[1]  Syed Othman Alhabshi dan Hamiza Ibrahim, 1998.  Pengurusan dan Pentadbiran:  Mencapai kecemerlangan     melalui penghayatan nilai.  Kuala Lumpur:  Institut Kefahaman Islam Malaysia (IKIM), hlm. 2.

[2]   Ibid, hlm. 24.

 [3]  Mustafa Haji Daud, 1994.  Pengurusan Islam.  Kuala Lumpur:  Utusan Publications and Distributions Sdn. Bhd.       hlm. 1.

[4]   Ibid, hlm. 25.

[5]   Ibid., hlm. 1.

[6]   Ibid , hlm. 13.

[7]   Ibid., hlm. 31.

[8]  Ibid., hlm. 32.

[9] Peter F. Drucker Management Expert, Author and Teacher.  (2013).  Dari  www.cgu.edu.

[10] Pengurusan Islam Abad Ke 21, 1996.  Kuala Lumpur:  TINGGI PRESS Sdn. Bhd.  m.s. 56-65.

 [11] Muhammad Imaduddin.  (2012).  10 Mac 2012, dari www.ustazimad.com .

Proses Pengendalian Pengurusan

Disediakan oleh

SYAHIRAH BINTI SAHRIN                                                         

NURALIAH NATRA BINTI SUHALI             

PENGHARGAAN

            Dengan Nama Allah Yang Maha Pemurah Lagi Maha Penyayang.  Alhamdulillah, syukur ke hadrat Ilahi yang telah mengurniakan rahmat-Nya sehingga dapat kami menyempurnakan  segala tugasan yang telah diberikan kepada kami dengan jayanya.  Terlebih dahulu kami ingin merakamkan setinggi-tinggi penghargaan dan ucapan terima kasih yang tidak terhingga kepada Ustazah Maruwiah Ahmat yang telah memberikan bimbingan, teguran dan nasihat yang diberikan sepanjang kami menyempurnakan tugasan ini.

            Seterusnya, ribuan terima kasih juga kepada kedua ibu bapa kami yang telah memberikan sokongan penuh kepada kami dalam proses menyiapkan tugasan ini.  Kami juga ingin memberikan penghargaan kepada Perpustaakan Universiti Teknologi Mara (UiTM) kerana telah menyediakan bahan bacaan yang mencukupi untuk kami membuat sebarang rujukan bagi mencari maklumat tugasan.

Akhir sekali, terima kasih buat rakan-rakan dan juga kepada orang perseorangan yang turut membantu secara langsung mahupun tidak langsung dalam menjayakan penulisan ini.  Sekali lagi kami memanjatkan doa kesyukuran ke hadrat Ilahi, agar segala usaha yang disumbangkan diberkati oleh Allah s.w.t di dunia dan akhirat.  Sekian, terima kasih.

 

PENDAHULUAN

           Di dalam pengurusan Islam asas pengurusan merupakan perkara yang perlu diberi penekanan bagi mencapai sesuatu matlamat.  Asas pengurusan Islam ini lebih kepada cara sesebuah organisasi mengendalikan syarikatnya mengikut undang-undang Islam yang termaktub di dalam Al-Quran dan As-Sunnah.  Asas pengurusan Islam dibahagikan kepada empat bahagian iaitu Takhtit(perancangan), Tanzim(Penyusunan), Qiyadah(kepimpinan) dan Wiqayah(pengawasan).  Takhtit atau juga disebut sebagai perancangan didefinisikan sebagai usaha-usaha mengenalpasti matlamat yang hendak dicapai dan penetapan cara untuk mencapai matlamat tersebut sesuai dengan keupayaan yang dimiliki. Satu proses menentukan objektif yang dikehendaki dan seterusnya membina strategi-strategi tindakan yang sesuai dan terbaik dengan mengambil kira faktor-faktor dalam organisasi dan persekitaran luaran yang akan mempengaruhi perjalanan sesebuah organisasi untuk mencapai objektif tersebut.  Seperti yang kita ketahui, perancangan merupakan aspek paling penting dalam pengurusan.  Rasullulah S.A.W. sendiri mempraktikan asas pengurusan ini dalam perancangan dakwahnya iaitu secara sulit dan terang-terangan di Mekah, perancangan Hijrah dan perancangan menyusun negara Madinah.  Takhtit mempunyai prinsip, kepentingan dan prosesnya yang tersendiri.

            Seterusnya ialah Tanzim atau juga dikenali sebagai pengorganisasian.  Tanzim ialah kewujudan sekumpulan manusia yang tersusun, mempunyai penyelarasan, kesarasian dan hubungan yang rapat di antara mereka, mempunyai matlamat-matlamat tertentu dan qiadah yang melaksanakan urusan pentadbiran dan mengambil berat kepentingan mereka serta merancang untuk mencapai matlamat-matlamat mereka.  Asas-asas pengurusan tanzim adalah berstrategik dimana ia lebih menitik beratkan dalam menentukan dan menjelaskan misi operasi sesuatu organisasi tersebut kepada setiap anggota dan bukan anggota.  Pengorganisasiannya juga mempunyai objektif  yang jelas untuk dicapai.  Pelan tindakan juga akan disediakan terlebih dahulu sebelum membuat sesuatu perancangan.  Antara ciri-ciri yang mencabar pengurusan ialah merumitkan, menghairankan, mengelirukan, mengaburkan dan di zaman siber.

Asas pengurusan Islam yang ketiga ialah Qiyadah(kepimpinan).  Qiyadah bermaksud kepimpinan melibatkan keupayaan seseorang mentadbir atau mengurus setiap peringkat pengurusan untuk mendorong, mempengaruhi, membawa dan menggunakan setiap sumber organisasi supaya saling berperanan atau masing-masing berfungsi untuk mencapai objektif yang telah ditentukan.  Di dalam aspek qiyadah pula adalah melibatkan peransangan pekerjaan, penentuan visi dan hala tuju organisasi, dan menjadi penghubung.  Pemimpin yang unggul mempunyai sifat seorang pemimpin yang adil, berilmu, berani, amanah, jujur, dan bertanggungjawab.  Rasulullah merupakan tokoh pemimpin umat Islam yang terunggul.

Bukan itu sahaja, di dalam pengurusan Islam Wiqayah(pengawasan)  juga merupakan salah satu asas pengurusan Islam yang sangat penting.  Wiqayah pula didefiniskan sebagai pengawasan yang berperanan untuk memastikan segala urusan pengurusan organisasi berjalan mengikut perancangan yang ditetapkan.  Di samping itu, tugas bahagian pengawasan ini juga mendedahkan mana-mana kesilapan yang berlaku dalam pengurusan.  Kemudian, mereka bertindak dengan segera untuk membetulkan sebarang kesilapan atau penyelewengan yang berlaku dalam sesebuah organisasi dengan mengambil tindakan yang sewajarnya mengikut peraturan undang-undang.  Untuk pengetahuan kita bersama, pengawasan dalam pengurusan Islam mempunyai tiga jenis iaitu pengawasan dalam diri manusia(kendiri), pengawasan dari masyarakat, dan pengawasan dari pihak pengurusan.

Asas pengurusan Islam juga terkandung tentang Fiqh Al-Awlawiyat.  Fiqh Al-Awlawiyat bermaksud dari segi istilah ialah terdiri dari dua perkataan.  Pertama ialah “Fiqh” yang bermaksud kefahaman.  Lazimnya ia dikaitkan dengan hukum, maka dengan itu ia bermaksud kefahaman terhadap sesuatu hukum.   Al-Awlawiyat berasal dari perkataan “Awla” yang bermaksud utama, unggul dan penting.  Apabila dihubungkan menjadi Fiqh al-Awlawiyat, ia bermaksud kefahaman dalam membezakan hukum ke arah yang lebih utama, lebih unggul dan lebih penting.  Secara ejaan, Fiqh al-Awlawiyat tidak wujud di dalam al-Qur’an dan al-Sunnah, akan tetapi secara maksud dan konsep, ia wujud secara jelas di dalam kedua-dua sumber mulia tersebut.

 

 

Terbahagi kepada EMPAT(4) proses, iaitu:

 

Takhtit (Perancangan)

Perancangan ialah usaha-usaha mengenalpasti matlamat yang hendak dicapai dan penetapan cara untuk mencapai matlamat tersebut sesuai dengan keupayaan yang dimiliki. Satu proses menentukan objektif yang dikehendaki dan seterusnya membina strategi-strategi tindakan yang sesuai dan terbaik dengan mengambil kira faktor-faktor dalam organisasi dan persekitaran luaran yang akan mempengaruhi perjalanan sesebuah organisasi untuk mencapai objektif tersebut.  Menurut Ustaz Azizee, perancangan takhtit dalam bahasa Arab, adalah elemen yang sangat penting untuk memenangkan dakwah.[1]  Perancangan di dalam dakwah melalui fasa-fasa yang menuntut kepada strategi dan perancangan.  Takhtit mempunyai empat prinsip perancangan iaitu setiap individu dalam organisasi mempunyai perancangan, dilaksanakan secara jamaah, bersifat fleksible dan akhirnya sekali segala keputusan ditentukan oleh Allah S.W.T.  Seterusnya, sebelum melaksanakan sesuatu aktiviti organisasi tersebut perlulah membuat perancangan terlebih dahulu.  Hal ini demikian kerana setiap perancangan yang dilakukan adalah untuk menentukan jangkamasa kerja dan kos yang terlibat, menyediakan target bagi melakukan operasi keseluruhan pengurusan, dan untuk memastikan keutamaan bagi membolehkan pengawalan mutu kerja, masa operasi  dan pelaksanaan kerja.

Bukan itu sahaja, perancangan juga mempunyai prosesnya yang tersendiri.  Proses yang pertama ialah mengenalpasti matlamat atau objektif bagi aktiviti yang bakal dilaksanakan.  Objektif tersebut mestilah rasional, praktikal, boleh diukur  dan boleh dicapai.  Matlamat sesuatu perancangan juga mestilah berhairerki dan rangkaian.  Proses yang kedua ialah menilai keupayaan sumber dan persekitaraan.  Aktiviti yang dirancang oleh sesebuah organisasi itu perlulah menghitung jumlah bajet yang mencukupi, bekalan atau sumber juga semuanya mudah didapati dan melihat keadaan persekitaran samada aktiviti tersebut sesuai atau tidak dilaksanakan dilokasi yang dipilih oleh organisasi.  Walhal, aspek ramalan, kekuatan, kelemahan, peluang dan halangan yang bakal dihadapi juga perlu dikenalpasti kerana aspek ini juga merupakan proses yang sangat penting didalam perancangan.   Proses perancangan yang terakhir ialah membuat pelan tindakan untuk rancangan yang ingin dilaksanakan.  Sebelum melaksanakan sesuatu aktiviti yang dirancang, pihak organisasi perlulah mengatur strategi yang sistematik agar matlamat perancangan tersebut berjaya dicapai.

Nabi Muhammad S.A.W. merupakan seorang teladan yang baik untuk kita ikuti dalam membuat sebarang perancangan.  Baginda telah banyak terlibat dalam perancangan membangunkan masyarakat Islam seperti berdakwah.  Didalam dakwahnya di Mekah, Rasulullah lebih menitik beratkan akidah masyarakat di Mekah dengan pengukuhan ajaran Islam.  Masyarakat Islam pada masa itu merupakan masyarakat yang kecil dan Baginda merancang strategi sehingga berjaya menjadi Islam sebagai tamadun teragung di dunia.  Pengukuhan ajaran Islam ini telah diterapkan dalam perancangan kerajaan Islam mengikut ketetapan yang datangnya dari Allah S.W.T.  selain itu, baginda juga menyeru manusia supaya menyembah Allah S.W.T.  Masyarakat pada masa itu telah dibangunkan dengan falsafah menyeru manusia beribadat kepada Allah S.W.T., menegakkan keadilan dan konsep sama rata di antara orang Islam dan bukan Islam.  Rasulullah S.A.W. telah menggunakan dua strategik ketika melaksanakan dakwahnya iaitu Rasulullah S.A.W. telah berdakwah secara rahsia selama 13 tahun hanya dengan ahli keluarganya dan sahabat rapatnya sebelum baginda diizinkan oleh Allah untuk berdakwah secara terang-terangan. Manakala, secara terang-terangan pula baginda mula memperluaskan dakwahnya dengan Bani Hasyim dan penduduk sekitar di Mekah.  Firman Allah S.A.W. :  “maka siarkanlah apa-apa yang telah diperintahkan (Allah) kepadamu dan berpalinglah daripada orang-orang musyrik”  (Al-Hijr 94).

 

Didalam dakwah Nabi Muhammad S.A.W., baginda telah membuat beberapa perancangan sebelum bertindak di khalayak ramai.  Antara perancangan tersebut adalah merancang pengorganisasian, melaksanakan rancangan penghijrahan para pengikutnya ke Habsyah dan perancangan pentadbiran untuk berhijrah ke Madinah pula pada 1 Hijrah atau 622 Masihi.  Rasulullah S.A.W. telah melakukan dua perancangan awal iaitu perancangan yang pertama ialah memelihara akidah Islamiah.  Hal ini           demikian kerana di Madinah terdapat penganut Islam yang berasal dari Mekah dan ada juga yang berasal dari Madinah.  Baginda lebih menitik beratkan akidah untuk menyatupadukan masyarakat.  Perancangan yang kedua ialah baginda memberikan kebebasan beragama.  Ini telah membolehkan masyarakat bukan beragama Islam berinteraksi dengan masyarakat Islam.

Tanzim (Pengorganisasian)

Tanzim didefinikan sebagai satu kewujudan sekumpulan manusia yang tersusun, mempunyai penyelarasan, kesarasian dan hubungan yang rapat di antara mereka, mempunyai matlamat-matlamat tertentu dan qiadah yang melaksanakan urusan pentadbiran dan mengambil berat kepentingan mereka serta merancang untuk mencapai matlamat-matlamat mereka.  Maksud Tanzim dari segi bahasa ialah mengumpulkan sesuatu serta menyusun dan menyelaraskannya.  Dari segi istilah pula Tanzim beerti kewujudan sekumpulan manusia yang tersusun, mempunyai penyelarasan, keserasian dan hubungan yang rapat di antara mereka, mempunyai matlamat-matlamat tertentu dan qiadah yang melaksanakan urusan pentadbiran dan mengambil berat kepentingan mereka serta merancang untuk mencapai matlamat-matlamat mereka.  Pengurusan tanzim mempunyai asasnya yang tersendiri antaranya ialah menentukan dan menjelaskan misi organisasi kepada anggota dan bukan anggota agar sesuatu rancangan dapat difahami oleh semua anggota dan perancangan dapat berjalan dengan baik.  Asas pengurusan tanzim yang kedua ialah sentiasa menganalisa kekuatan dan kekurangan dalaman organisasi.  Konteks ini membawa maksud sesebuah organisasi perlulah membuat perancangan yang mampu dicapai bukannya diluar kemampuan organisasi tersebut.  Seterusnya, asas yang ketiga ialah menilai setiap peluang dan ancaman luaran organisasi.  Sebelum membuat sesuatu rancangan, sesebuah organisasi perlulah terlebih dahulu mengenali siapa saingannya.  Asas yang keempat ialah menjelaskan objektif yang hendak dicapai.  Objektif perancangan hendaklah jelas bagi memudahkan setiap anggota didalam organisasi untuk melaksanakna tugas mereka dengan sistematik untuk memastikan perancangan tersebut berjaya dicapai.  Asas pengurusan tanzim yang terakhir ialah membentuk strategik dan pelan tindakan.

 

Setiap organisasi mempunyai ciri-ciri syarikat yang mencabar pengurusannya samada didalam organisasi mahupun diluar organisasi.  Ciri-ciri organisasi pengurusan yang mencabar ialah merumitkan. Ia dianggap rumit kerana terlampau kompleks untuk difahami oleh ahli-ahli dalam organisasi.[2]  Kelakuan dan pemikiran manusia agak kompleks untuk diterokai dan mereka mempunyai cara berinteraksi yang berbeza dan menyulitkan bagi individu atau kumpulan tertentu.  Terdapat juga organisasi yang menghairankan iaitu sesuatu organisasi dipenuhi dengan pelbagai kejutan kerana pergerakan dan perkembangannya amat sukar diramalkan.  Kemudian, mengelirukan juga merupakan salah satu ciri organasasi yang mencabar kerana setiap individu mempunyai pendapat yang berbeza terhadap sesuatu pembaharuan yang dibuat.  Mereka menunjukkan reaksi yang mengelirukan jika tidak setuju dengan pendapat yang telah diutarakan oleh individu yang lain.[3]  Seterusnya ialah organisasi yang mengaburkan.  Ia berkaitan dengan pandangan seseorang yang kabur terhadap apa yang sebenarnya berlaku dalam sesuatu organisasi yang beroperasi.  Ciri-ciri organisasi yang mencabar pengurusan yang terakhir adalah organisasi di Zaman Siber.  Perkara ini menjelaskan tentang Organisasi yang dilaksanakan terasa lebih mencabar apabila wujudnya Sistem Perkomputeran dan ICT yang canggih kerana setiap kemajuan tersebut perlu diaplikasikan dalam setiap pengurusan.  Cabaran zaman siber juga akan menjadi lebih kompleks jika para pekerja seperti pihak pengurusan tidak mahir di dalam penggunaan IT dalam kehidupan dan perkerjaan harian mereka.[4]

Kewujudan tanzim akan merealisasikan beberapa faedah penting kepada individu dan jamaah antaranya ialah tanzim haraki merupakan antara factor penting kejayaan jamaah.  Hal ini demikian kerana ia mampu menolong jamaah mencapai matlamatnya dalam masa yang singkat.  Menurut Ahmad Abd al-Mun’im al-Badri (33), tanzim membekalkan kekuatan yang padu kepada jamaah ketika melaksanakan amal dan menghasilkan produk, berbanding jika setiap individu di dalam jamaah bekerja seorang diri dengan kemampuan yang tersendiri dalam keadaan terasing daripada individu-individu yang lain.  Ini disebabkan Allah S.W.T. memberkati usaha-usaha individu jika dia berada di dalam satu jamaah yang tersusun.  Rasulullah S.A.W. bersabda:  “Tangan Allah bersama jamaah.”[5]  Seterusnya, tanzim juga  memberikan kemahiran yang pelbagai dalam bidang ilmiah, kesenian, pengurusan, kepimpinan, kemasyarakatan, peperangan dan lain-lain.  Setiap individu mempunyai kekuatan dan kemantapan diri sendiri untuk keteguhan tanzim di dalam diri mereka.  Allah S.W.T. berfirman:  “Kami akan menguatkan tenaga dan daya usahamu dengan saudaramu.”[6]  Faedah yang lain ialah tanzim melindungi individu daripada masyarakat yang memusuhi Islam, sentiasa bersedia berhadapan dengan dasar-dasar yang mampu menyesatkan umat islam.  Selaint itu, tanzim juga mendorong manusia untuk berjaya, sama ada dalam keadaan cergas atau sebaliknya.  Sebagaimana firman Allah S.W.T. “saling berpesan-pesan dengan kebenaran dan saling berpesan-pesan dengan kesabaran[7],  ia bermaksud bersatu sebagai jamaah akan mengurangkan kesakitan, halangan dan kesukaran yang mungkin menimpanya kerana individu tanzim selalu menghulurkan bantuan serta menasihati agar bersabar dan teguh pendirian dalam menghadapi kesempitan di perjalanan.  Apa yang telah dinyatakan diatas adalah berkaitan dengan faedah-faedah tanzim.

 

Qiyadah ( Kepimpinan )

Qiyadah bermaksud kepimpinan.  Dari segi bahasa Qiyadah bermaksud menyelia atau mengawasi.  Qiadah dari segi istilah pula adalah melaksanakan tugas yang dikhususkan kepadanya dan menyelia serta mengawasi orang lain yang di bawahnya.[8]  Penyeliaan dalam bahasa Arab dipanggil Al-Taujih.[9]  Kepimpinan melibatkan keupayaan seseorang mentadbir atau mengurus setiap peringkat pengurusan untuk mendorong, mempengaruhi, membawa dan menggunakan setiap sumber organisasi supaya saling berperanan atau masing-masing berfungsi untuk mencapai objektif yang telah ditentukan.  Dalam hal ini, Qiyadah dikaitkan dengan merangsang pekerja bahawan untuk berperanan supaya matlamat dapat dicapai.  Selain itu, menentukan visi dan hala tuju organisasi dipatuhi.  Seterusnya, menjadi penghubung atau juruacara sesebuah organisasi.

Qiyadah juga sering dikaitkan dengan pemimpin unggul.  Antara contoh pemimpin unggul adalah adil.  Seorang pemimpin hendaklah adil dalam melaksanakan sesuatu tugas agar segala perkara terlaksana dengan harmoni tanpa sebarang pertelingkahan.  Pemimpin juga perlu berani agar dapat menyelesaikan sebarang masalah dalam menghadapi sebarang cabaran untuk menyelesaikan sesuatu perancangan yang hendak dicapai.  Apabila pemimpin tersebut berani maka segala tugas dapat diselesaikan dengan segera.  Namun begitu, seorang pemimpin perlu amanah dan jujur.  Hal ini kerana pemimpin yang amanah dan jujur dapat mengelakkan sebarang tipu helah berlaku di kalangan organisasi.  Akhir sekali, sebagai seorang pemimpin juga, sikap bertanggungjawab adalah pokok utama dalam melaksanakan sesebuah organisasi agar dapat menjalankan tugas dengan penuh ikhlas dan bersungguh-sungguh sehinggalah dapat mencapai hasrat yang ingin dicapai.

Zaman Rasulullah SAW semasa menjalankan sistem Qiyadah

            Pada Zaman Rasullullah s.a.w. sebagai pemimpin tertinggi yang dilantik oleh pemimpin yang Maha Tinggi amat wajar dijadikan uswah hasanah. Sewaktu baginda menjadi pemimpin, baginda sering bersabar menghadapi sebarang kesukaran dan menjaga rahsia daripada bocor ke tangan musuh yang lain dengan apa jua cara sekalipun.  Gaya kepimpinan, dorongan dan sifat baginda yang penyayang telah berjaya merangsang umat Islam untuk mencapai matlamat yang dirancang.  Baginda juga sering menjiwai bahawa tanggungjawab yang dipikul adalah besar dan berat.

Baginda mempunyai kemampuan untuk menerajui dan menyusun masa.  Ini dapat dilaksanakan berbekalkan asset dan potensi pengalamannya yang banyak di bidang tersebut.  Kebijaksanaan baginda sebagai pemimpin dapat dilihat dalam banyak peristiwa, antaranya melalui kandungan “Perlembagaan Madinah”.  Hal ini, baginda sering memiliki persediaan dan persiapan untuk berjihad.  Baginda juga seorang pemimpin yang mempunyai keinginan yang padu,, keazaman yang teguh dan niat yang ikhlas untuk berjihad pada jalan Allah.  Apabila berlaku perselisihan di kalangan mereka – hendaklah dirujuk kepada Allah dan Muhammad Rasulullah s.a.w.”

Perkembangan ini menjelaskan keagungan dan kekuasaan mutlak Rasulullah s.a.w. dalam semua hal; awam, politik, ketenteraan, kehakiman dan lain-lain diiktiraf oleh penduduk Madinah.  Rasulullah s.a.w adalah seorang pemimpin yang sangat berjaya sewaktu pemerintahan beliau dalam membangunkan umat di seluruh penduduk Madinah pada ketika itu.  Kesimpulannya, Rasulullah s.a.w mempunyai ciri-ciri pemimpin yang sangat baik untuk dijadikan contoh dan teladan bagi umat masa kini sehinggalah masa hadapan supaya negara kita dapat berkembang dengan maju.

 

Sifat-sifat kenabian yang perlu dihayati oleh umat Islam masa kini

            Terdapat beberapa sifat kenabian yang perlu dihayati oleh umat Islam masa kini.  Antaranya adalah amanah.  Amanah boleh ditakrifkan dengan jujur dan amanah dalam melaksanakan segala pekerjaan yang hendak diselesaikan atau sewaktu menjalankan dakwah.  Hal ini kerana, sikap amanah mampu menjadikan seseorang terhindar dari sikap suka menipu.

Seterusnya pula, sikap siddiq iaitu sentiasa berkata benar terutama sekali apabila menyampaikan dakwah Islamiyah agar mudah diterima dengan baik dan agar umat Islam tahu bahawa ajaran Islam itu adalah sangat baik kerana menyeru umat Islam untuk sentiasa berkata benar dan tidak menipu.  Oleh itu, segala urusan yang hendak dicapai dapat dicapai dengan baik atas persetujuan dan penerimaan orang sekeliling kita.

Selain itu, tabliq juga adalah merupakan salah satu sifat kenabian yang perlu dicontohi oleh umat Islam masa kini.  Tabliq ialah menyampaikan sesuatu perkara dengan bersungguh-sungguh dan penuh hikmah semasa berdakwah ke jalan yang benar.  Apabila kita dapat menyampaikan sesuatu perkara dengan bersungguh-sungguh terutama sekali semasa berdakwah, maka orang sekeliling akan mudah yakin dengan apa yang kita katakan.  Akhir sekali, Fatanah yang dikenali sebagai bijaksana.

Menurut Syed al-Attas, kebijaksaan ialah pengetahuan yang dianugerahkan oleh Allah yang membolehkan seseorang menggunakan maklumat yang sesuai untuk menhasilkan keputusan yang tepat.[10]  Ianya sangat diperlukan apabila menyampaikan sesuatu ilmu atau dakwah kerana ianya sangat penting bagi memastikan dakwah yang disampaikan adalah betul.  Orang yang bijaksana akan mudah disegani dan dihormati oleh orang sekeliling kita kerana mempunyai ilmu pengetahuan yang dapat merungkaikan sebarang permasalahan sekiranya berlaku.

 

R. LIPPIT DAN R. WHITE MENJELASKAN BAHAWA KEPIMPINAN BARAT ITU TERBAHAGI KEPADA TIGA

            Pertama sekali adalah demokrasi.  Demokrasi bermaksud segala keputusan itu ditentukan oleh suara teramai.  Ketua sekadar menjadi pengerusi perbincangan.  Ahli pula bebas dalam mengemukakan pendapat atau keputusan.  Pekerja dalam organisasi dan pengurusan bebas memilih rakan kongsi pekerjaan.  Ketua juga boleh memahami dan menghayati aspirasi orang bawahannya melalui wakil-wakil mereka sendiri.  Dalam hal ini, semua orang boleh terlibat dalam perbincangan tersebut agar dapat mencapai kata sepakat bersama-sama tanpa perselisihan faham agar tidak timbul sebarang masalah yang melibatkan rasa tidak puas hati.

Kedua pula adalah autokras.  Dalam kepimpinan seperti ini pemimpin mempunyai kuasa mutlak sebagai perancang dan juga pelaksana.  Segala keputusan yang diambil akan terlebih dahulu dibincangkan dengan orang bawahan.  Ia dijalankan secara berperingkat-peringkat.  Pembahagian tugas dan tanggungjawab diagih oleh pemimpin.  Perjumpaan juga dirancang apabila perlu sahaja.  Ini bermaksud, hanya pemimpin sahaja yang berkuasa dalam menyuarakan kata putus setelah dibincangkan oleh orang-orang bawahan yang lain dan seperti yang kita tahu perbincangan ini hanya diadakan bila perlu sahaja.  Ini membuktikan bahawa proses seperti ini boleh menyebabkan ada segelintir orang yang tidak akan menerima keputusan yang akan diambil kerana bukan atas persetujuan semua orang ramai.  Ketiga pula adalah laissez faire.  Dalam konteks ini, pemimpin seolah-olah tidak berfungsi.  Rakyat dan orang bawahannya yang akan menentukan segala-galanya.  Pemimpin menyampaikan maklumat tertentu dan membekalkan sumber serta bahan untuk pekerjanya.

 

KEWAJIPAN PEMIMPIN

Terdapat beberapa kewajipan seorang pemimpin yang perlu kita pelajari.  Antaranya adalah bekerjasama dalam melaksanakan syariah Islamiyah.  Contohnya, melalui organisasi, jabatan dan unit pengurusan, seseorang ketua dan pemimpin boleh memainkan peranannya menggalakkan amal makruf dan nahi mungkar.  Syariah Islamiyah terlaksana apabila budaya, etika dan prinsip kerja dalam organisasi itu bersumberkan al-Quran dan al-Sunnah serta berasaskan akidah, syarak dan akhlak.  Apabila umat islam merujuk sumber al-Quran dan al-Sunnah maka segala urusan dapat dijalankan dengan baik dan tidak mempunyai sebarang kesalahan dari segi hukum.

Seterusnya pula adalah melaksanakan tugas dengan ikhlas dan jujur.  Dalam hal ini, ketua dan pemimpin diberikan kuasa, tanggungjawab serta ganjaran, upah dan gaji yang setimpal.  Namun begitu, mereka tidak wajar sekadar menyempurnakan tugas sebagai pemimpin atau ketua semata-mata.  Mereka hendaklah melaksanakan tugas dengan ikhlas dan jujur.  Keikhlasan dalam melakukan setiap pekerjaan pasti akan membuahkan hasil yang baik dan penuh hikmah.

Selain itu, kewajipan pemimpin juga adalah amanah.  Selain daripada itu, ketua juga wajib melaksanakan tugas dan tanggungjawab dalam suatu organisasi dengan amanah.[11]   Islam melarang ketua dan pemimpin dalam organisasi menyalahgunakan kuasa dalam dua bentuk iaitu menggunakan jawatan untuk kepentingan kebendaan dengan menerima rasuah dan seterusnya pula adalah menjalankan tugas dan tanggungjawab secara pilih kasih.  Oleh itu, ketua dan pemimpin memainkan peranan yang penting dalam mengajak umat Islam untuk menjadi lebih berakhlak mulia dalam melaksanakan pekerjaan.

 

Hak-hak Pemimpin:

Dalam konteks ini, pemimpin boleh memperoleh pelbagai hak kemudahan.  Contohnya, mendapat ketaatan dan kesetiaan daripada orang bawahan terhadap arahannya yang tidak bertentangan dengan akidah, syarak dan akhlak.  Hak ini dijamin oleh Allah SWT di dalam al-Quran.  Dalam hak-hak pemimpin, pemimpin haruslah mempunyai pengukuhan dari segi pelbagai pengukuhan iaitu kemahiran.  Kemahiran yang pertama adalah konsepsi.  Maksudnya disini adalah ketepatan perjalanan organisasi.  Ia memahami pandangan umum dan juga mempunyai kaliber kepimpinan yang tersendiri.  Selain itu, arif dan juga berkeupayaan menarik orang bawahannya untuk mencapai matlamat organisasi.  Ketepatan dalam mencapai sebuah perjalanan organisasi adalah sangat penting agar segala tugasan dapat diselesaikan dalam masa yang telah ditetapkan.  Seterusnya pula adalah kemahiran komunikasi.

Kemahiran komunikasi membawa maksud kepada kemampuan untuk berhubung mesra dengan individu dan masyarakat.   Komunikasi itu akan lebih berkesan dan mudah jika ia mempunyai kefahaman berkaitan dengan orang bawahan dan masyarakat sekeliling.  Ia mempunyai daya penggerak untuk kepentingan organisasi dan pengurusan.

Akhir sekali adalah kemahiran teknikal.  Maksudnya pula ialah mempunyai ilmu yang mendalam terhadap segala hal berkaitan dengan tugas pengurusan dan berkeupayaan pula melaksanakannya.  Selain itu, berkeupayaan menggunakan alat-alat teknik secara manual dan kemahiran itu amat diperlukan agar dapat mencapai matlamat organisasi.  Kemahiran teknikal sehingga kini adalah sangat diperlukan bagi menyelenggara sebarang pekerjaan.  Sekiranya kemahiran ini tidak ada, maka amat sukar sesuatu pekerjaan itu dilaksanakan kerana kurangnya ilmu mengenai kemahiran teknikal tersebut.

 

 Wiqayah (Pengawasan/Pengawalan)

Dari segi bahasa Wiqayah bermaksud pengawasan dan pengawalan.  Pengawasan dan pengawalan amat penting kerana ia merupakan asas dalam menentukan matlamat organisasi tercapai atau tidak.  Pengawasan dalam bahasa Arab ialah raqabah dan muraqabah.[12] Memastikan semua aspek pengurusan saperti perancangan, penyusunan, kepimpinan, membuat keputusan, dan pelaksanaan keputusan berjalan mengikut apa perancangan yang ditetapkan.  Ia juga sebagai alat yang mengukur kelicinan perjalanan sesuatu program dan mewujudkan langkah-langkah perlu untuk mengatasi sesuatu masalah yang timbul.  Seperti yang kita tahu, apabila kita menubuhkan sesebuah organisasi, masalah memang tidak dapat dielakkan kerana hal ini memang sentiasa menjadi kebiasaan bagi sesebuah organisasi.

Oleh itu, pengawasan adalah sangat penting bagi mengambil langkah berjaga-jaga dalam menghindarkan sebarang masalah besar berlaku.  Mendedahkan mana-mana kesilapan yang berlaku dalam pengurusan. Membetulkan sebarang kesilapan penyelewengan dengan tindakan yang sewajarnya mengikut lunas undang-undang.  Kebijaksanaan pengurus amat diperlukan dalam hal ini kerana dalam proses ini, manusia yang diawasi itu punyai perasaan, maka sewajarnya dibezakan kaedah mengurus atau mengawal manusia dan mesin.  Pengawasan dan pengawalan merupakan fungsi terakhir dalam sesuatu pengurusan atau pentadbiran.  Dalam melaksanakan sesuatu tugasan, pengawasan sangat penting bagi memastikan sesuatu organisasi dapat dilaksanakan dengan terkawal tanpa sebarang gangguan dari mana-mana orang atau masalah yang tidak sepatutnya timbul.  Konklusinya, wiqayah juga memainkan peranan yang penting dalam mengawal sesebuah organisasi agar keadaan tidak menjadi huru-hara dan semakin rumit.  Pemimpin haruslah lebih bijak mengawal sesebuah organisasi dengan lebih teratur dan sistematik.

TIGA JENIS PENGAWASAN DALAM PENGURUSAN ISLAM

Terdapat tiga jenis pengawasan dalam pengurusan Islam.  Antaranya adalah pengawasan dalaman diri manusia atau kendiri.[13]  Pengurusan Islam amat mementingkan pengawasan dalaman diri manusia sendiri.  Setiap manusia seharusnya faham bahawa mereka adalah khalifah serta hamba kepada Allah.  Sebagai khalifah mereka mesti jelas mereka diutus untuk mengatur atau melicinkan perjalanan alam. Mereka tidak boleh merosakkan amanah yang dipertanggungjawabkan kepada mereka.  Sebagai hamba, manusia akan patuh kepada segala arahan Penciptanya.  Seterusnya, pengawasan dalam masyarakat juga adalah salah satu lagi antara pengawasan dalam pengurusan Islam.  Masyarakat yang prihatin akan memastikan tanggungjawab ini terlaksana.

Sabda Rasulullah SAW bermaksud “Sesiapa antara kamu yang melihat kerosakan (kejahatan, kebejatan dll) hendaklah ia mengubahnya dengan tangan (kuasa), sekiranya ia tidak mampu hendaklah ia mengubahnya dengan lidah (lisan spt nasihat atau tunjuk ajar dan sebagainya) dan sekiranya tidak mampu hendaklah ia mengubahnya dengan hati (spt membenci kejahatan tersebut) dan yang demikian itu adalah selemah-lemah iman”.

Dalam ayat di atas, dijelaskan bahawa sekiranya di antara kita sebagai umat Islam yang melihat sebarang kejahatan sedang berlaku maka hendaklah ia mengubahnya dengan tangan dan sekiranya tidak mampu maka hendaklah ia mengubahnya dengan lidah.  Contohnya, menyampaikan nasihat ataupun tunjuk ajar bagi memberhentikan kejahatan tersebut agar tidak berlaku.  Seterusnya, jika tidak mampu juga hendaklah ia mengubahnya dengan hati seperti membenci kejahatan tersebut.  Akhir sekali, pengawasan dari pihak pengurusan.  Pihak pengurusan berperanan mengawasi perjalanan organisasi mereka supaya ia selamat.

 

Pesanan Nabi Muhammad s.a.w. kepada Saidina Ali bin Abi Talib:

“Aku lantik engkau dan aku sentiasa mengawasimu, oleh itu nampakkanlah pada mata orang ramai bahawa engkau mengutamakan golongan yang berkedudukan rendah daripada golongan orang mulia yang lemah mendahului yang kuat dan golongan perempuan mendahului golongan lelaki, jangan sekali-kali kemu benarkan orang lain mencapai urusan engkau, dan selalulah merujuk kepada al-Quran itu adalah panduan kamu. Pengawas yang sebenarnya adalah dari dalam diri manusia itu sendiri”

Contohnya, pada zaman Rasulullah majlis syura telah ditubuhkan bagi membuat sebarang perbincangan bagi persediaan untuk berperang.  Majlis syura pada ketika itu sangat penting di kalangan umat Rasulullah s.a.w. kerana ianya sangat membantu dalam penyediaan strategi peperangan yang sangat baik sehinggalah majlis tersebut telah membawa kebaikan yang sangat berbaloi buat Rasululla s.a.w dan umat yang lain.[14]  Hal ini kerana sebelum peperangan Badar berlaku, Rasulullah mengadakan perbincangan bagi membuat strategi peperangan dan perancangan tersebut membawa kepada kemenangan pertama peperangan di kalangan umat Islam.  Ini adalah salah satu kelebihan pengawasan yang boleh kita lihat.  Ianya sangat penting untuk memastikan segala pelaksanaan yang hendak dibuat berjalan dengan lancar dan baik.  Maka dengan itu, pengawasan sangat penting untuk dicontohi oleh umat Islam masa kini.  Pada zaman khulafa al-Rasyidin juga majlis syura berfungsi untuk pemilihan khalifah yang akan memimpin umat Islam selepas kewafatan Nabi Muhammad s.a.w.

 

FIQH AL-AWLAWIYAT DALAM PENGURUSAN ISLAM

Mutakhir ini, jarang sekali umat Islam dapat membuat satu keputusan, melakukan satu pekerjaan dan melaksanakan satu ibadah melainkan pasti dia berhadapan dengan dua atau lebih keadaan yang saling bertembung dari sudut hukum agama.  Pertembungan mungkin berlaku antara yang halal dengan yang haram, antara yang halal dengan yang halal, antara yang haram dengan yang haram dan perkara halal yang hanya dapat diperolehi melalui cara yang haram.

Istilah ini terdiri dari dua perkataan. Pertama ialah “Fiqh” yang bermaksud kefahaman.  Lazimnya ia dikaitkan dengan hukum, maka dengan itu ia bermaksud kefahaman terhadap sesuatu hukum.  Al-Awlawiyat berasal dari perkataan “Awla” yang bermaksud utama, unggul dan penting.  Apabila dihubungkan menjadi Fiqh al-Awlawiyat, ia bermaksud kefahaman dalam membezakan hukum ke arah yang lebih utama, lebih unggul dan lebih penting. Secara ejaan, Fiqh al-Awlawiyat tidak wujud di dalam al-Qur’an dan al-Sunnah, akan tetapi secara maksud dan konsep, ia wujud secara jelas di dalam kedua-dua sumber mulia tersebut.

Fiqh Al-Awlawiyat mempunyai dua larangan yang saling bertembung, contoh situasi yang dapat dijelaskan adalah seperti berikut:  Katakanlah kita berhadapan dengan dua larangan dalam satu masa, larangan pertama hukumnya makruh manakala larangan kedua hukumnya haram. Maka tindakan yang benar ialah menjauhi kedua-duanya. Seterusnya, katakanlah kita hanya mampu menjauhi salah satu darinya, maka tindakan yang lebih utama ialah menjauhkan larangan yang hukumnya haram.  Tentu saja ini mudah untuk kita pertimbang dan utamakan.  Namun bagaimana jika kita berhadapan dengan dua larangan dalam satu masa dimana kedua-dua hukumnya adalah haram dan kita hanya mampu menjauhi salah satu darinya? Di sinilah terdapatnya kepentingan Fiqh Al-Awlawiyat.

Kes seumpama ini pernah disentuh oleh Allah SWT dalam firman-Nya:

Mereka bertanya kepadamu (wahai Muhammad) mengenai (hukum) berperang dalam bulan yang dihormati; katakanlah: “Peperangan dalam bulan itu adalah berdosa besar, tetapi perbuatan menghalangi (orang-orang Islam) dari jalan Allah dan perbuatan kufur kepada-Nya, dan juga perbuatan menyekat (orang-orang Islam) ke Masjid al-Haram (di Makkah), serta mengusir penduduknya dari situ, (semuanya itu) adalah lebih besar dosanya di sisi Allah. Dan(ingatlah), angkara fitnah itu lebih besar (dosanya) daripada pembunuhan (semasa perang dalam bulan yang dihormati).[15] 

Dalam ayat tersebut, umat Islam berhadapan dengan dua larangan yang saling bertembung dalam satu masa:

Larangan yang pertama adalah berperang dalam bulan-bulan yang dihormati, iaitu bulan Zulkaedah, Zulhijjah, Muharram dan Rejab. Peperangan memiliki mafsadat di sebaliknya seperti kehilangan nyawa dan kerosakan harta benda, maka larangan berperang pada bulan-bulan yang dihormati adalah bagi mengurangi mafsadat tersebut.  Larangan kedua pula adalah membiarkan musuh-musuh menghalangi umat Islam dari jalan Allah, khasnya menghalang umat Islam dari memasuki Kota Mekah untuk beribadah di Masjid al-Haram sekali pun dalam bulan-bulan yang dihormati. Jika dibiarkan, tindakan musuh ini akan memberi mafsadat kepada Islam dan umatnya.

Di sini dapat dirumuskan beberapa kaedah Fiqh al-Awlawiyat bahawa dibolehkan mencapai matlamat yang disuruh dengan cara yang dilarang dengan syarat-syarat yang telah ditetapkan iaitu maslahat di sebalik matlamat adalah jauh lebih besar sementara mafsadat di sebalik cara adalah jauh lebih kecil.  Seterusnya, maslahat di sebalik matlamat memberi kesan jangka masa panjang sementara mafsadat di sebalik cara memberi kesan jangka masa pendek.  Selain itu, maslahat di sebalik matlamat memberi kesan kepada orang yang besar jumlahnya sementara kekurangan di sebalik cara memberi kesan kepada orang yang kecil jumlahnya.  Akhir sekali, Maslahat di sebalik matlamat bersifat pasti sementara mafsadat di sebalik cara bersifat kemungkinan.

Kepentingan Fiqh al-Awlawiyat.  Allah Subhanahu wa Ta’ala berfirman:

Mereka bertanya kepadamu (wahai Muhammad) mengenai (hukum) berperang dalam bulan yang dihormati; katakanlah: “Peperangan dalam bulan itu adalah berdosa besar, tetapi perbuatan menghalangi (orang-orang Islam) dari jalan Allah dan perbuatan kufur kepada-Nya, dan juga perbuatan menyekat (orang-orang Islam) ke Masjid al-Haram (di Makkah), serta mengusir penduduknya dari situ, (semuanya itu) adalah lebih besar dosanya di sisi Allah. Dan (ingatlah), angkara fitnah itu lebih besar (dosanya) daripada pembunuhan (semasa perang dalam bulan yang dihormati). [al-Baqarah 2:217]

Fiqh al-Awlawiyat sangat penting diamalkan sehingga kini kerana ianya boleh membantu umat Islam dalam menyelesaikan sesuatu hukum.  Sekiranya berlaku sebarang pertelingkahan mengenai hukum dalam Islam, umat Islam bolehlah merujuk Fiqh al-Awlawiyat bagi mengetahui hukum tersebut boleh diterima dalam Islam ataupun tidak.  Terdapat beberapa kaedah fiqh al-Awlawiyat.  Antaranya adalah maslahat di sebalik matlamat adalah jauh lebih besar sementara mafsadat di sebalik cara adalah jauh lebih kecil.[16]  Seterusnya, maslahat di sebalik matlamat memberi kesan jangka masa panjang sementara mafsadat  di sebalik cara memberi kesan jangka masa pendek dan maslahat di sebalik matlamat memberi kesan kepada orang yang besar jumlahnya sementara mafsadat di sebalik cara memberi kesan kepada orang yang kecil jumlahnya serta maslahat di sebalik matlamat bersifat pasti sementara mafsadat di sebalik cara bersifat kemungkinan.[17]

RUMUSAN

Berdasarkan tugasan yang kami laksanakan, kami telah mempelajari serba sedikit mengenai pengurusan Islam dengan betul malah secara mendalam.  Seperti yang kita tahu, Islam tidak menggalakkan kehadiran konflik yang boleh menjejaskan prestasi organisasi dan  yang boleh menghancurkan nilai-nilai persahabatan. Hal ini supaya segala salah faham dapat dielakkan malah akan mewujudkan sebuah suasana yang harmoni dan sejahtera.  Selain itu, berkenaan pengurusan islam juga mampu membawa kita ke arah ciri-ciri muslim yang bijak. Pengurusan Islam telah mengajar kita sebagai umat Islam untuk lebih berdisiplin dan menepati masa dengan betul.  Apatah lagi dalam suasana umat Islam sekarang ini yang mundur dalam serba serbi persoalan.  Umat Islam pada zaman sekarang telah dipengaruhi banyak oleh kuasa-kuasa Barat di luar sana.

Jika direnung sejenak, umat Islam kita sebenarnya hendak dipengaruhi mentalitinya terutama dari segi akidah agar umat Islam tidak akan lagi taat kepada Rasulullah SAW dan mengingati Allah SWT.  Seiring dengan itu, umat Islam masa kini hendaklah sentiasa berusaha memperbaiki ke arah bertaqwa kepada Allah SWT.  Dalam menjana kemajuan Islam dari segi pengurusan pada masa kini, generasi muda hendaklah berusaha dalam menuntut ilmu bukan sahaja ilmu fardhu ain malahan fardhu kifayah juga agar Negara kita dapat menjadi salah sebuah Negara Islam yang maju di mata dunia.  Konsep pengurusan  Islam ini juga sering dikaitrapatkan dengan aspek fiqh al-awlawiyat kerana tanpa ilmu maka tidak sempurna lah ilmu dalam pelaksanaan pengurusan Islam.

Fiqh al-awlawiyat banyak mengajar umat Islam untuk sentiasa melakukan kebaikan dan meninggalkan segala yang dilarang seperti amar ma’ruf nahi munkar.  Konsep ini harus dititikberatkan oleh umat Islam agar kita sentiasa mengetahui syariat Islam dalam mengurus sebarang pekerjaan dalam Islam. Oleh itu, janganlah pula kita menjadi mundur dalam persoalan. Maksudnya disini adalah persoalan mengenai akidah umat Islam masa kini terutama di kalangan remaja.  Syariat dalam pengurusan Islam harus dititikberatkan oleh umat Islam dan tidak patut dipandang enteng.

Pengurusan Islam akan banyak membawa kesan-kesan baik kepada umat Islam agar hidup lebih maju dapat berdiri sama tinggi dan duduk sama rendah dengan negara luar yang lain.  Intihanya, kita hendaklah sentiasa menjaga segala peraturan atau syariat dalam melaksanakan pengurusan Islam dengan merujuk aspek dari segi konsep fiqh al-Awlawiyat agar segala pengurusan dalam Islam dapat dilaksanakan dengan sempurna.

RUJUKAN ISTILAH

Mafsadat    =  kerosakan atau akibat buruk yang menimpa seseorang atau sekelompok ke atas perbuatan atau tindakan yang bercanggah dengan hukum.

Maslahat    =  Sesuatu yang mendatangkan kepada kebaikan atau faedah.

Aspirasi      =  Keinginan yg kuat untuk dicapai atau cita-cita.

Spesifikasi  =  Butiran terperinci yang ditentukan untuk sesuatu atau suatu perincian tentang sesuatu.

Khalifah     =  Generasi manusia yang dipilih oleh Allah s.w.t. sebagai pengganti-Nya untuk mentadbir, menggurus dan memakmurkan muka bumi ini dengan menjalankan syariah Allah s.w.t. sama ada di peringkat peribadi, keluarga, masyarakat, negara dan antarabangsa.

 

RUJUKAN

American Psychological Association (APA)

Ahmad Nursadi Asmawi.  (2009).  Fiqh Al-Awlawiyat ( Fiqh Keutamaan ).  Selangor

Darul Ehsan:  Thinker’s Library Sdn. Bhd.

Asmadi Mohamed Naim.  (2008).  Maqasid Syariah dan Pemikiran Pengurusan

Islam.  Perpustakaan Negara Malaysia:  Universiti Utara Malaysia.

Ab. Mumin Ab. Ghani.  (2006).  Dimensi Pengurusan Islam.  Kuala Lumpur:

Universiti Malaya.

Ahmad Abd al-Mun’im.  (1998).  Tanzim Hierarki dalam Islam.  Kuala Lumpur:

Pustaka Salam Sdn. Bhd.

Abdul Shukor Abdullah.  (2004).  Pengurusan Organisasi (Perspektif Pemikiran dan Teori).    Selangor:  Perpustakaan Negara Malaysia.

 

Modern Language Association (MLA)

Ahmad Nursadi Asmawi. Fiqh Al-Awlawiyat ( Fiqh Keutamaan ).  Selangor Darul Ehsan:  Thinker’s Library Sdn. Bhd., 2009.

Asmadi Mohamed Naim.  Maqasid Syariah dan Pemikiran Pengurusan Islam. Perpustakaan Negara Malaysia:  Universiti Utara Malaysia, 2008.

Ab. Mumin Ab. Ghani.  Dimensi Pengurusan Islam.  Kuala Lumpur:  Universiti Malaya, 2006.

Ahmad Abd al-Mun’im.  Tanzim Hierarki dalam Islam.  Kuala Lumpur:  Pustaka Salam Sdn. Bhd., 1998.

Abdul Shukor Abdullah.  Pengurusan Organisasi (Perspektif Pemikiran dan Teori).  Selangor:   Perpustakaan Negara Malaysia., 2004.

 


[2] Abdul Shukor Abdullah, 1993.  Pengurusan Organisasi (Perspektif Pemikiran dan Teori).  Selangor:  Perpustakaan Negara Malaysia.  hlm.3.

[3]Ibid, hlm.5.

[4] Mohamad Shaid Mohd Taufek, 2000:  126

[5]Riwayat al-Tarmizi daripada Ibnu Abbas.

[6] Al-Qasas:  35

[7] Al-‘Asr:  3

[8] Ahmad Abd al-Mun’im al-Badri, 1998.  Tanzim Haraki Dalam Islam.  Kuala Lumpur:  Pustaka Salam.  hlm.41.

[9] Asmadi Mohamed Naim, 2003.  Maqasid Syariah dan Pemikiran Pengurusan Islam.  Perpustakaan Negara Malaysia:  Universiti Utara Malaysia.  hlm.65.

[10] Ab. Mumin Ab. Ghani, Fadillah Mansor, 2006.  Dimensi Pengurusan Islam.  Kuala Lumpur:  Universiti Malaya.  hlm.175.

[11] Ibid, hlm.176.

[12] Asmadi Mohamed Naim, op.cit., hlm.67.

[13] Ibid, hlm.68.

[14] Ab. Mumin Ab. Ghani, Fadillah Mansor, op.cit., hlm.91.

[15] Al-Baqarah 2:217

[16] Prof. Dr. Yusuf Abdullah Al-Qardhawi, 2009.  Fiqh Al-Awlawiyat (Fiqh Keutamaan).  Selangor:  Thinkers Library Sdn. Bhd, hlm.27.

[17] Hafiz Firdaus Abdullah.  Fiqh Al-Awlawiyat dan Kepentingannya kepada umat Islam mutakhir ini.  hlm.2 http://www.hafizfirdaus.com

KERTAS KERJA TERBAIK SESI JUN-OCT 2013 (DIP)

Kertas kerja terbaik untuk sesi Jun-Oct 2013 adalah seperti berikut:

CTU 101 – Rahsia Membaca Al-Quran (Thaqif, Syafiq Nazmi & Arif Hamadi)

CTU 151 – Imam asy-Syafie (Khairul Nizam, Ariff dan Marzuki)

IDA 152 – Teori Kedatangan Islam ke Nusantara (Fleycylia & Lyana)

CTU 263 –

Pengenalan Pengurusan Islam (Faridah & Nurafiqah)

Sejarah Pengurusan Islam Zaman Rasulullah SAW (Aiza Shaffi, Nur Nedijah & Nurlyiana)

Proses Pengendalian Pengurusan (Syahirah & Nuraliah Natra)

Metode Komunikasi Menurut al-Quran (Nur-amalina & Nurul Sutienna)

 

Diharapkan ia dapat memberi rujukan kepada para pelajar lain. Bukan untuk diplagiat. Kertas kerja ini adalah dalam bentul asal tanpa suntingan.

RAHSIA MEMBACA AL-QURAN

Disediakan oleh

Mohammad Thaqif bin Taher

Syafiq Nazmi bin Ekhwan

Arif Hamadi bin Bohari

 

1.                  PENGENALAN

Dalam kehidupan seorang muslim dan muslimah, amalan membaca, memahami dan mempelajari serta menghayati Al-Quran merupakan suatu tanggungjawab dan ibadah yang penting.  Al-Quran merupakan ‘kitab Allah’ yang mempunyai banyak rahsia kelebihan apabila seseorang membaca kitab suci ini.

Apabila seseorang itu mendekati dirinya dengan membaca Al-Quran, maka seseorang itu akan dipelihara dengan sebaik-baiknya.  Mereka akan tergolong dalam kalangan orang-orang yang baik seperti mana menurut Ustman r.a.,katanya Rasulullah s.a.w bersabda:

‘Sebaik-baik kalian  adalah orang yang belajar Al-Quran dan mengajarkannya.’ (Dr ‘Aidah Abdullah Al-Qarni, 2006: 8)

Oleh yang demikian, adalah menjadi kerugian yang amat besar bagi mereka yang tidak membaca Al-Quran kerana banyak hikmah yang menjadi rahsia disebalik membaca Al-Quran.

Definisi

Perkataan ‘rahsia’ menurut pengertiannya dalam buku Kamus Dewan bermaksud  ‘sesuatu yang tersembunyi atau yang belum diketahui oleh orang’.  (Kamus Dewan, 2005: 1268) Manakala perkataan ‘membaca’ pula membawa maksud ‘memerhati isi sesuatu yang tertulis atau tercetak dengan teliti dan memahamkan makna kandungannya serta mengucapkan apa yang tertulis atau tercetak pada buku, papan tanda dan sebagainya secara lisan.’.  (Ibid,: 99)  Aktiviti membaca merupakan satu daripada kemahiran yang  penting dalam proses untuk mempelajari sesuatu.  Oleh itu, banyak kelebihannya jika seseorang itu boleh membaca dengan baik.

‘Al-Quran’ menurut catatan dalam buku ‘Tafsir Al-Quran dan Terjemahan’ bererti ‘bacaan’ yang mengambil kira perkataan asalnya iaitu ‘qara’an. Al-Quran juga didefinisikan sebagai Kalam Allah SWT yang merupakan mu’jizat yang diturunkan (diwahyukan) kepada Nabi Muhammad s.a.w dan yang ditulis di mushaf dan diriwayatkan dengan mutawatir serta membacanya adalah ibadah’. (Prof. R.H.A Soenarjo S.H., 1971: 15)

Selain itu, Al-Quran juga merupakan kitab suci yang terakhir diturunkan oleh Allah SWT, yang isinya terkumpul wahyu Ilahi yang menjadi petunjuk, pedoman dan pelajaran bagi sesiapa yang mengamalkannya. (Ibid,: 102)

 

Latar Belakang

            Dari segi Sejarah, Al-Quran diturunkan secara berperingkat-peringkat dalam masa 22 tahun, 2 bulan dan 22 hari iaitu selama 13 tahun di Mekah dan 10 tahun di Madinah. Ayat-ayat Al-Quran tidak diturunkan sekali gus.  Hal ini kerana terdapat suruhan-suruhan tertentu dan juga larangan-larangan tertentu daripada Allah SWT kepada umat Islam yang lebih mudah diturunkan secara beransur-ansur.  Turunnya ayat-ayat tersebut adalah bersesuaian dengan peristiwa-peristiwa yang berkaitan.  Terdapat juga ayat-ayat yang diturunkan itu merupakan jawapan terhadap pertanyaan ataupun penolakan terhadap suatu pendapat.

Al-Quran diturunkan dengan pelbagai cara.  Antaranya ialah dengan cara malaikat memasukkan wahyu ke dalam hati Nabi Muhammad s.a.w.  Dalam hal ini, Rasulullah s.a.w tidak melihat apa-apa tetapi hanya merasa bahawa wahyu itu sudah berada dalam kalbunya.  Selain itu, Al-Quran juga diturunkan dengan cara malaikat menyerupai seorang lelaki yang mengucapkan kata-kata kepadanya sehingga Rasulullah s.a.w mengetahui dan menghafalkannya.  Wahyu juga datang kepada Rasulullah s.a.w seperti bunyi gemerincing loceng.  Cara ini dikatakan amat berat kerana kening Rasulullah s.a.w berpeluh dengan banyaknya walaupun pada musim dingin ketika menerima wahyu. Akhir sekali, terdapat cara malaikat menampakkan dirinya yang sebenar kepada Nabi Muhammad s.a.w.  Hal ini ada disebut dalam Al-Quran Surah An Najm ayat 13 dan 14 yang bermaksud:

“Sesungguhnya Muhammad telah melihatnya pada kali yang lain (kedua).  Ketika (ia berada) di Sidratulmuntaha.” (Ibid,: 15)

Ayat-ayat yang diturunkan di Mekah dinamakan ‘ayat-ayat Makkiyyah’.  Ayat-ayat ini umumnya mengandungi hal-hal yang berhubung dengan keimanan, ancaman dan pahala.  Terdapat juga kisah-kisah umat yang terdahulu yang mengandungi pengajaran dan budi pekerti.  Manakala ayat-ayat yang diturunkan di Madinah dinamakan ‘ayat-ayat Madaniyyah’.  Ayat-ayat ini pula biasanya mengandungi hukum-hukum, antaranya yang berhubungan dengan hukum adat atau hukum duniawi seperti hukum kemasyarakatan, hukum ketatanegaraan, hukum perang, antarabangsa dan juga antara agama.

Kitab suci Al-Quran terdiri daripada 114 surat dan dibahagi kepada 30 juz. Pembahagian ini telah dilakukan oleh bahagian pencetakan Amiriyah milik pemerintahan Mesir semenjak tahun 1337 Hijrah sehingga sekarang dan diikuti di negara-negara lain seluruh dunia. (Ibid,: 16)

  1. 2.                  ADAB MEMBACA AL-QURAN

Terdapat adab-adab tertentu jika seseorang hendak membaca Al-Quran.  Adab membaca Al-Quran sudah diatur dengan baik untuk penghormatan dan keagungan Al-Quran.   Menurut catatan buku Tafsir Al-Quran dan Terjemahan, (Ibid,: 105) terdapat sepuluh adab membaca Al-Quran yang terpenting yang menjadi panduan kepada sesiapa sahaja yang hendak membaca kitab suci Al-Quran.

Adab yang pertamanya ialah disunatkan sebelum membaca Al-Quran, hendaklah mengambil wuduk dan dalam keadaan yang bersih.  Sebaik-baiknya hendaklah mengambil Al-Quran dengan menggunakan tangan kanan dan memegangnya dengan kedua belah tangan.

Adab yang kedua pula ialah disunatkan membaca Al-Quran di tempat yang bersih seperti di rumah, di surau, di mushalla dan di tempat-tempat lain yang bersih.  Namun begitu, tempat yang paling utama ialah di masjid.

Adab yang ketiga pula ialah disunatkan membaca Al-Quran menghadap ke kiblat dan membaca dengan khusyu’ serta tenang.  Seterusnya adab yang keempat, ketika membaca Al-Quran, mulut hendaklah bersih, tidak berisi makanan.  Sebaik-baiknya sebelum membaca Al-Quran, mulut dan gigi hendaklah dibersihkan terlebih dahulu.

Adab yang kelima ialah sebelum membaca Al-Quran, disunatkan membaca ta’awwudz yang berbunyi “a’udzubillahi minasy syaitanirrajim. Bismillahirrahmanir rahim.” yang bertujuan untuk meminta perlindungan Allah SWT, supaya terjauh dari pengaruh tipu daya syaitan, sehingga hati dan fikiran tetap tenang di waktu membaca Al-Quran, juga terjauh dari pengaruh atau godaan.  Biasa juga sebelum atau sesudah membaca ta’awwudz itu, seseorang itu boleh berdoa dengan maksud memohon kepada Allah SWT supaya hatinya menjadi tenang.

Adab yang keenam pula ialah disunatkan membaca Al-Quran dengan tartil iaitu dengan bacaan yang perlahan-lahan dan tenang, sesuai dengan firman Allah dalam Surah Al-Muzzammil, Ayat 4 yang bermaksud:

“Dan bacalah Al-Quran itu dengan ‘tartil’

Bacaan secara ‘tartil’ ini akan mempengaruhi jiwa serta lebih mendatangkan ketenangan batin dan rasa hormat kepada Al-Quran.

Adab seterusnya ialah bagi orang yang sudah mengerti maksud ayat-ayat Al-Quran, disunatkan membacanya dengan penuh perhatian dan pemikiran tentang ayat-ayat yang dibacanya itu dengan maksudnya.  Cara pembacaan seperti inilah yang dkehendaki, iaitu lidahnya bergerak membaca, hatinya turut memperhatikan dan memikirkan maksud serta mendalami isi yang terkandung dalam Al-Quran.

Hal ini akan mendorongnya untuk mengamalkan isi Al-Quran itu.  Umpamanya, apabila bacaan sampai kepada ayat tasbih, maka dibacanya tasbih dan tahmid.  Apabila sampai kepada doa dan istighfar, lalu berdoa dan minta ampun.  Apabila sampai kepada ayat azab, lalu meminta perlindungan kepada Allah SWT dan apabila sampai kepada ayat rahmat, lalu memohon rahmat kepada Allah SWT dan begitulah seterusnya.   Terdapat juga keadaan yang disunatkan sujud, apabila membaca ayat-ayat Sajadah dan sujud itu dinamakan ‘sujud tilawah’.

Adab  yang ke lapan pula ialah dalam membaca Al-Quran itu hendaklah benar-benar diresapkan erti dan maksudnya, lebih-lebih apabila sampai kepada ayat-ayat yang menggambarkan nasib orang-orang yang berdosa, dan bagaimana hebatnya siksaan yang disediakan bagi mereka.  Sehubungan dengan itu, menurut riwayat, ramai sahabat telah mencucurkan air mata di kala membaca dan mendengar ayat-ayat suci Al-Quran yang berkenaan.

Adab yang ke sembilan ialah disunatkan membaca Al-Quran dengan suara yang merdu dan bagus, sebab suara sedemikian akan menambahkan lagi keindahan Al-Quran.  Oleh yang demikian, disunatkan melagukan bacaan Al-Quran dan diingatkan agar tidak melanggar ketentuan-ketentuan dan tata-cara membaca Al-Quran sebagaimana yang telah ditetapkan dalam ilmu qiraat dan tajwid, seperti menjaga madnya, harakatnya (barisnya), idghamnya dan sebagainya.  Sesiapa yang melagukan Al-Quran dengan cara bermain-main dan melanggar ketentuan maka hukumnya haram.  Orang yang membaca tersebut dianggap fasiq dan orang yang mendengarkannya turut berdosa.

Adab yang ke sepuluh dan yang terakhir ialah ketika membaca Al-Quran, janganlah diputuskan hanya kerana hendak berbicara dengan orang lain.  Pembacaan tersebut hendaklah diteruskan sampai ke batas yang telah ditentukan, barulah disudahi dengan sempurna.  Tidak dibenarkan ketawa, bermain-main dan sebagainya ketika membaca Al-Quran kerana perbuatan ini tidak baik dan tidak menghormati kesucian dan keagungan Al-Quran.

  1. 3.                  RAHSIA MEMBACA AL-QURAN

Rahsia merupakan sesuatu yang tersembunyi atau sesuatu yang belum diketahui oleh orang ramai. Banyak rahsia yang besar dan amat berharga yang tersembunyi di sebalik amalan membaca kitab suci Al-Quran. Berikut ditunjukkan beberapa rahsia penting yang diperoleh daripada amalan membaca Al-Quran.

 

Rahsia Mendapat Hikmah

Perkataan hikmah’ menurut Ustaz Ahmad Zainal Abidin ialah sesuatu yang membawa kebaikan dan manfaat kepada kehidupan manusia. (http://muis.ismaweb.net/2010/04)

Seseorang yang membaca kitab suci Al-Quran, akan mendapat hikmah yang besar tentang Al-Quran.  Dalam Surah Al-Baqarah, ayat 269 ada menjelaskan bahawa seseorang yang mempunyai hikmah adalah mereka yang mempunyai kefahaman yang dalam tentang Al-Quran dan As Sunnah. Maksud ayat 269 adalah seperti berikut:

“Allah menganugerahkan al Hikmah (kefahaman yang mendalam tentang Al-Quran dan As-Sunnah) kepada siapa yang Dia kehendaki. Dan barang siapa yang dianugerahi al-hikmah itu, ia benar-benar telah dianugerahi kurnia yang banyak. Dan hanya orang-orang yang berakallah yang dapat mengambil pelajaran (dari firman Allah).

  Oleh yang demikian, hikmah yang bermaksud ‘kefahaman yang mendalam tentang Al-Quran’ adalah merujuk kepada seseorang yang membaca Al-Quran akan dikurniakan  pengetahuan dan kefahaman yang mendalam tentang ilmu-ilmu Al-Quran serta mendapat kebaikan dan manfaat dalam kehidupan mereka. Bukan mudah untuk mendapat hikmah dalam Al-Quran dan tidak semua orang akan terpilih untuk mendapat hikmah kefahaman yang mendalam tentang ilmu Al-Quran.  Hal inilah yang menjadi rahsia yang paling istimewa bagi orang yang membaca Al-Quran.

 

Rahsia Mendapat Ganjaran dan Kebaikan

Seseorang yang membaca Al-Quran akan mendapat ganjaran yang besar. Tidak kira seseorang itu mahir atau kurang mahir dalam bacaannya, jika mereka membaca Al-Quran, tetap akan mendapat ganjaran yang besar.  Hal ini ada dijelaskan oleh Aisyah r.a. Beliau berkata: Rasulullah s.a.w bersabda:

Orang yang membaca Al-Quran sedangkan dia seorang yang mahir, maka dia akan bersama dengan malaikat safarah yang menghitung amalan kebaikan lagi yang berbuat kebajikan.  Manakala sesiapa yang membaca Al-Quran dalam keadaan tergagap-gagap dan sukar, maka dia akan memperoleh dua ganjaran.”  (Iman Al-Nawawi, 1997: 17)

Selain itu, Allah SWT akan menggandakan kebaikan seseorang yang membaca Al-Quran walaupun dengan bacaan satu huruf seperti mana yang dipetik daripada Abdullah bin Mas’ud r.a. iaitu katanya Rasulullah s.a.w bersabda: (Ibid.,: 20)

“Sesiapa yang membaca satu huruf daripada kitab Allah, dia akan memperoleh satu kebaikan.  Satu kebaikan akan digandakan dengan sepuluh kali ganda.  Aku tidak mengatakan bahawa alif lam mim itu satu huruf.  Tetapi alif satu huruf, lam satu huruf dan mim satu huruf.”

 

Rahsia Mendapat Syafaat dan Kemudahan

Seseorang itu juga akan mendapat syafaat jika membaca Al-Quran.  Daripada Abu Umamah al-Bahili r.a, beliau mendengar Rasulullah s.a.w bersabda:

“Bacalah Al-Quran.  Sesungguhnya di hari kiamat nanti ia akan datang sebagai pemberi syafaat bagi orang yang mencintainya.  Bacalah surah Al-Baqarah dan Ali Imran, maka sesungguhnya keduanya akan datang hari kiamat nanti bagaikan dua awan dari kumpulan burung-burung yang membela orang-orang yang membacanya”. Riwayat Muslim. (Dr ‘Aidah Abdullah Al-Qarni, 2006: 9)

Oleh yang demikan, seseorang yang membaca kitab suci Al-Quran akan dilindungi oleh syafaat Al-Quran pada hari kiamat nanti.  Maka beruntunglah bagi mereka yang membaca Al-Quran.     Selain itu, seseorang yang membaca Al-Quran juga akan diberikan kemudahan di dunia dan diakhirat, seperti yang disampaikan oleh Abdullah Ibn Amr Ibn al-As, katanya Rasulullah bersabda:

“Sahabat Al-Quran akan diberitahu baca dan naik, naiklah dengan segala kemudahan sebagaimana engkau telah membaca dengan segala kemudahan di dunia.  Tempat diammu adalah ketinggian yang engkau capai di ayat terakhir yang engkau baca.” (Khuram Murad, 1994:26)

 

 

Rahsia Mendapat Ketenangan Hati

Seseorang yang kerap membaca Al-Quran, hati dan jiwa akan sentiasa tenang dan tidak dihancurkan atau dikecewakan hati mereka. Begitu juga orang yang mendengar ayat-ayat Al-Quran yang dibacakan. Akan tetapi bagi mereka yang tidak mendekati diri dengan Al-Quran, Allah SWT akan mengazabkan hati mereka.  Sesiapa yang mencintai Al-Quran, Allah akan menjadikan hati mereka aman dan gembira. Hal ini telah dijelaskan oleh Abdullah bin Mas’ud r.a., katanya daripada Rasulullah s.a.w., bersabda:

“Bacalah Al-Quran.  Sesungguhnya Allah SWT tidak akan mengazabkan hati yang menyimpankan Al-Quran.   Sesungguhnya Al-Quran adalah hidangan Allah.  Sesiapa yang memasukkinya, maka dia berada dalam keadaan aman.  Sesiapa yang menyintai Al-Quran maka bergembiralah.” (Iman Al-Nawawi, 1997: 22)

Jelaslah kepada kita bahawa segala kesulitan dan kesedihan yang dihadapi oleh manusia akan disinari oleh rahmat Allah melalui ayat-ayat suci Al-Quran.

 

Rahsia Mendapat Petunjuk Jalan

Al-Quran merupakan penerang kehidupan manusia.  Kehidupan yang penuh dengan pancaroba atau cabaran memerlukan rahmat Allah SWT sebagai petunjuknya. Sesuai dengan firman Allah SWT dalam Surah Al-Baqarah, Ayat 38 yang bermaksud:

‘Akan datang kepada kamu petunjuk-Ku, dan barang siapa yang mengikut petunjuk-Ku itu, nescaya tidak ada ketakutan atas mereka dan tidak mereka berdukacita.’

Justeru menurut Khuram Murad dalam bukunya ‘Jalan Menuju Al-Quran’ (terjemahan), Al-Quranlah satu-satunya senjata untuk membantu diri kita yang lemah dalam mengharungi dunia yang penuh kejahatan dan hawa nafsu yang menyesatkan.  Al-Quranlah satu-satunya ‘cahaya’ (nur) ketika kita teraba-raba dalam kegelapan, lalu kita pun terselamat dan menempuh kejayaan. (1994: 20)

Al-Quran boleh membantu manusia menyelasaikan masalah kehidupan mereka.  Banyak pengajaran dan panduan hidup serta hukum-hukum tertentu ditemui dalam Al-Quran seperti menyelesaikan masalah rumah tangga ataupun pergaulan. Bagi mereka yang membaca dan mempelajari isi kandungan Al-Quran, mereka tidak akan mengalami kesesatan dan kehancuran dalam kehidupan mereka.

 

Rahsia Menjaga Kesihatan

            Al-Quran juga mempunyai rahsia dalam usaha menjaga kesihatan.  Al-Quran telah menjelaskan banyak perkara yang berkaitan dengan kesihatan pada seluruh anggota badan.  Jika seseorang itu tidak membaca dan memahami kandungan Al-Quran, nescaya seseorang itu tidak mengetahui rahsia penjagaan kesihatan yang tersembunyi dalam ayat-ayat Al-Quran.  Sebagai contoh, kita diminta agar makan makanan yang seimbang iaitu tidak makan dan minum secara berlebihan seperti firman Allah dalam surah Al-A’raf ayat 31, yang bermaksud:

“ Makan dan minumlah, dan janganlah berlebihan-lebihan.”

            Selain itu, Allah SWT juga berfirman tentang ‘ubat yang menyembuhkan’ dalam  surah An-Nahl, ayat 68-69 yang bermaksud:

“Dan Tuhanmu mewahyukan kepada lebah, “Buatlah sarang-sarang di bukit-bukit, di pohon-pohon kayu, dan di tempat-tempat yang dibikin manusia.” Kemudian makanlah dari tiap-tiap (macam) buah-buahan dan tempuhlah jalan Tuhanmu yang telah dimudahkan (bagimu).  Dari perut lebah itu keluar minuman (madu) yang bermacam-macam warnanya, di dalamnya terdapat ubat yang menyembuhkan bagi manusia.  Sesungguhnya pada yang demikian itu benar-benar terdapat tanda (kebesaran Tuhan) bagi orang-orang yang memikirkan.”

            Daripada surah di atas, telah terbukti secara ilmu kedoktoran bahawa madu merupakan penguat tubuh badan dan melawan racun yang timbul dari penyakit-penyakit tubuh serta boleh mengubati sebahagian penyakit kulit dan sebagainya. (Sa’id Salah Al-Fayyumiy, 2009: 107-108)

 

Rahsia Mendapat Hikmah Kelebihan Ilmu Pelbagai Disiplin

Orang yang membaca Al-Quran juga akan mendapat kelebihan ilmu pelbagai disiplin.  Mereka yang mempelajari dan membuat kajian tentang isi kandungan Al-Quran akan mengetahui lebih banyak rahsia tentang kehidupan manusia, alam semesta dan pelbagai lagi ilmu yang amat berguna kepada manusia di dunia dan di akhirat.

Jika ditinjau pada kandungan ayat-ayat Al-Quran yang diturunkan di Mekah dan di Madinah, ternyata terdapat pelbagai ilmu telah diturunkan oleh Allah SWT untuk umat Nabi Muhammad s.a.w.  Antaranya ialah ilmu yang berkaitan dengan keimanan, ancaman dan pahala selain perihal sejarah kisah-kisah umat yang terdahulu yang mengandungi pengajaran dan budi pekerti.  Terdapat juga maklumat tentang hukum-hukum kemasyarakatan, hukum ketatanegaraan, hukum perang, antarabangsa dan juga antara agama. (Prof. R.H.A Soenarjo S.H., 1971: 15-16)

Selain itu, ilmu yang berkaitan kejadian alam pula ada ditunjukkan melalui Surah Al-Baqarah, ayat 164 yang bermaksud:

“Sesungguhnya dalam penciptaan langit dan bumi, pertukaran malam dan siang, bahtera-bahtera yang berlayar di laut dengan membawa apa yang berguna untuk manusia, dan apa yang Allah SWT turunkan dari langit berupa air, lalu dengan air itu Dia hidupkan dan suburkan bumi selepas kering.  Dia sebarkan di bumi itu segala jenis haiwan, pengisaran angin serta awan antara langit dan bumi.  Pada semua itu terdapat ayat-ayat untuk kaum yang berakal.”

            Justeru, menurut M. Quraish Shihab (2013: xiii) melalui ayat-ayat suci Al-Quran, Allah SWT mengajak dan menuntut manusia untuk memperhatikan dan mengenal sekelilingnya.  Bahkan juga, terdapat ayat-ayat yang menunjukkan tanda dan bukti perihal kewujudan serta keesaan Allah SWT.  Banyak pelajaran (ilmu) dapat dipetik daripada ayat-ayat Allah SWT.

Rahsia Di sebalik Membaca Ayat dan Surah Tertentu

Meskipun hampir semua umat Islam mengetahui bahawa ayat-ayat Al-Quran adalah penawar kepada segala masalah dan penyakit, namun terdapat surah-surah tertentu yang sememangnya mempunyai rahsia kelebihan tersendiri.  Rahsia ini hanya dapat dirasai oleh mereka yang menghayati ayat Al-Quran dan surah berkenaan sahaja.  Antara Ayat dan Surah yang sememangnya diakui ada kelebihan tersendiri ialah Surah Al-Fatihah, Ayatul Kursi dan Surah Yasin.

Surah Al-Fatihah merupakan surah pembukaan atau “UMMUL KITAB” iaitu Induk Kitab dalam Al-Quran. Surah Al-Fatihah ini mengandungi banyak rahsia ilmu tentang Ketuhanan, Alam semesta, Akhirat, maupun Ibadah. Surah ini adalah surah rukun yang wajib dibaca ketika solat wajib  maupun solat sunat.  Sesungguhnya kandungan surah ini amat penting dalam kehidupan umat Islam. Maksud Surah Al-Fatihah adalah seperti berikut:

“Dengan nama Allah, Yang Maha Pemurah, lagi Maha Penyayang.Segala puji adalah bagi Allah, Tuhan semesta alam. Yang Maha Pemurah, lagi Maha Penyayang.  Yang Menguasai Hari Pembalasan (hari akhirat).Hanya Engkaulah yang kami sembah dan hanya Engkau kami mohon pertolongan. Tunjukilah kami jalan yang lurus. Jalan orang-orang yang telah Engkau telah anugerahkan nikmat kepada mereka, bukan (jalan) orang-orang yang Engkau murkai dan bukan pula (jalan) orang-orang yang sesat”

Sesungguhnya orang yang membaca surah ini mempunyai hikmah yang besar seperti mana yang dijelaskan oleh sabda Nabi Muhammad s.a.w.  yang bermaksud:

“Membaca Fatihah Al-Quran pahalanya seperti sepertiga Al-Quran”

Selain surah Al-Fatihah, Ayatul Kursi dan Surah Yasin juga mempunyai rahsia tersendiri. Muhammad Syafiq Ramli dalam bukunya ‘Rahsia dan Hikmah Ayatul Kursi dan Surah Yasin’ (2004) telah mengupas secara mendalam tentang kedua-dua surah ini.  Menurut beliau, Ayatul Kursi merupakan ayat yang paling agung di dalam Al-Quran (2004:32-34).  Imam Muslim telah meriwayatkan dari Ubaiy bin Ka’ab r.a., katanya:

“Rasulullah s.a.w bertanya kepadanya: ‘Wahai Abul Mundzir (kuniah Ubaiy bin Ka’ab), tahukah engkau ayat manakah di antara kandungan Kitabullah (Al-Quran) yang paling agung?’ Dia menjawab: “Allahu la ilaha illa hawal-hayyul-qayyum”.

Manakala menurut At-Tabarani yang meriwayatkan dari Al-Hasan bin Ali r.a., katanya:

“Rasulullah s.a.w. bersabda: “Sesiapa membaca Ayatul Kursi selepas sembahyang  wajib maka dia berada dalam perlindungan Allah SWT hingga sembahyang yang berikutnya.”

Surah Al-Baqarah, ayat 255 telah menjelaskan maksud Ayatul Kursi ini seperti berikut:

“Allah, tidak ada Tuhan melainkan Dia Yang Hidup kekal lagi berterusan mengurus (makhluk-Nya), tidak mengantuk dan tidak tidur.  Kepunyaan-Nya apa yang di langit dan di bumi.  Siapakah yang dapat  memberi  syafaat di sisi Allah tanpa izin-Nya? Allah mengetahui apa-apa di hadapan mereka dan di belakang mereka, dan mereka tidak mengetahui apa-apa ilmu Allah melainkan apa yang dikehendaki-Nya. Kursi Allah meliputi langit dan bumi.  Dan Allah tidak merasa berat memelihara keduanya, akan Allah Maha Tinggi lagi Maha Besar.”

Antara kelebihan Ayatul Kursi yang lain ialah sebagai penjaga keselamatan diri, untuk memohon suatu hajat, menghilang penyakit tertentu terutama penyakit kerasukan jin dan syaitan ataupun untuk memohon keampunan daripada Allah SWT. (Ibid.: 114-115)

Manakala Surah Yasin pula merupakan ‘hati Al-Quran’ seperti mana dijelaskan oleh Anas bin Malik r.a., katanya, Rasulullah s.a.w. bersabda:

“Setiap sesuatu mempunyai hati, dan hati Al-Quran adalah Surah Yasin.”

Kelebihan Surah Yasin apabila dibaca ialah seseorang itu akan beroleh kebahagiaan di samping digunakan sebagai senjata untuk menghadapi orang jahat dan digunakan untuk menemui pihak berkuasa dan orang ternama.  Surah Yasin juga digunakan untuk memohon rezeki, menolak bala, melanjutkan usia, memperoleh kecerdasan akal, menghindari kesusahan atau penyakit, dan memohon selamat dalam perjalanan serta menghalau jin.

Rasulullah s.a.w. ada bersabda seperti yang dirawayatkan oleh Ali bin Abi Talib r.a, katanya:

“Bacalah surah Yasin, kerana di dalamnya terdapat dua puluh berkat.  Orang yang lapar, membacanya akan kenyang.  Orang yang haus, membacanya akan segar.  Orang yang bujang,membacanya akan mendapat jodoh.  Orang yang takut, membacanya akan selamat.  Orang sakit, membacanya akan sembuh.  Orang yang di penjara, membacanya akan dikeluarkan.  Orang yang musafir, membacanya akan dibantu dalam perjalanannya. Orang yang ditimpa kesusahan, membacanya akan dihilangkan kesusahannya.  Orang yang sesat, membacanya akan mendapat petunjuk.  Orang yang dicuri hartanya, membacanya akan dikembalikan ke tempatnya.  Demikianlah keterangannya.”  (Ibid.: 128-129) 

Oleh yang demikian, adalah menjadi kerugian yang besar bagi orang yang tidak mendekatkan diri mereka dengan surah-surat dan ayat-ayat Al-Quran.

  1. 4.                  KERUGIAN TIDAK MENDEKATI AL-QURAN

Seseorang yang tidak membaca Al-Quran, jiwa akan terasa kosong dan hancur, ibarat sebuah rumah yang roboh.  Daripada Ibnu Abbas r.a, katanya Rasulullah s.a.w bersabda;

“Sesungguhnya orang yang di dalam hatinya tidak mengandungi Al-Quran umpama sebuah rumah yang roboh.” (Riwayat al-Tirmizi) (Iman Al-Nawawi, 1997: 21)

Menurut Dr A’idh Abdullah Al-Qarni (2006: 3-5), sesiapa yang tidak mahu memerhatikan Al-Quran, berpaling darinya, tidak menghayati ayat-ayatnya dan tidak membacanya, serta tidak mengamalkannya maka Allah SWT akan menurunkan kesengsaraan baginya berupa kehidupan yang susah, kerugian dan jauh daripada kasih sayang Allah SWT.  Manakala di akhirat kelak, akan dihina oleh Allah SWT di hadapan seluruh mata yang memandang.  Pada masa itulah Allah SWT akan melakukan pembalasan, seperti mana firman Allah SWT dalam Surah Thaha (ayat 126-127), maksudnya:

 “Demikianlah, telah datang kepadamu ayat-ayat Kami, maka kamu melupakannya, dan begitu (pula) pada hari ini kamupun dilupakan. Dan demikianlah Kami membalas orang yang melampaui batas dan tidak percaya kepada ayat-ayat Tuhannya.  Dan sesungguhnya azab di akhirat itu lebih berat dan lebih kekal.

Seseorang itu akan kehilangan petunjuk hidup, cahaya ilmu dan segala kasih sayang daripada Allah SWT dan orang di sekelilingnya sekiranya melupakan ayat-ayat Al-Quran.  Kehidupannya akan menjadi hambar dan gelap. Sesungguhnya membaca Al-Quran mempunyai banyak hikmah dan rahsia yang tersembunyi.

  1. 5.                  KESIMPULAN

Secara keseluruhannya, Al-Quran mempunyai banyak rahsia dan keistimewaan.  Secara ringkasnya Al-Quran merupakan mukjizat agung untuk Rasulullah, kandungannya amat lengkap dan merangkumi semua aspek kehidupan.  Selain itu, Al-Quran merupakan kitab suci yang terpelihara daripada sebarang perubahan.  Bahasanya sangat indah dan setiap huruf yang dibaca merupakan ibadah dan diberi pahala jika membacanya.

Al-Quran merupakan kitab suci yang berupaya membimbing manusia ke jalan yang sempurna di dunia dan di akhirat.   Sesungguhnya Allah SWT memberi rahmat kepada bukan sahaja kepada orang yang membaca tetapi juga kepada mereka yang mendengar bacaan Al-Quran.  Surah Al-A’raaf, ayat 204 ada menjelaskan hal ini, yang maksudnya:

“Dan apabila dibacakan Al-Quran, maka dengarkanlah (baik-baik) dan perhatikanlah dengan tenang, agar kamu mendapat rahmat.”

 

RUJUKAN

  1.  Dr ‘Aidah Abdullah Al-Qarni. (2006) Hidangan Al-Quran. Kuala Lumpur: Jasmin Enterprise.
  2. Kamus Dewan Edisi Keempat (2005) Kuala Lumpur: Dewan Bahasa dan Pustaka.
  3. M. Quraish Shihab (2013) Dia Di mana-mana.  Selangor: PTS Darul Furqab sdn. Bhd.               
  4. Muhammad Syafiq Ramli (2004) Rahsia dan Hikmah Ayatul Kursi dan Surah Yasin.  (2004)  Kuala Lumpur: Jasmin Enterprise.
  5. Prof. R.H.A Soenarjo S.H. (1971) Tafsir Al-Quran dan Terjemahan. Arab Saudi: Lembaga Pencetakan Kerajaan Arab Saudi.
  6. Sa’id Salah Al-Fayyumiy. (2009) Ilmu Perubatan dalam Al-Quran. Kuala Lumpur: Al-Hidayah Publication.
  7.  Iman Al-Nawawi. (1997) Adab-adab Bersama Al-Quran. Kuala Lumpur: Pustaka Salam Sdn. Bhd.
  8. Khurram Murad. (1994) Jalan Menuju Al-Quran. (diterjemahkan oleh Zanariah Yahaya).  Kuala Lumpur: A.S. Noordeen.
  9. Ustaz Ahmad Zainal Abidin, Soal jawabMaksud perkataan ‘al-Hikmah’, MUIS (Majlis Ulama ISMA (Ikatan Muslimin Malaysia). http://muis.ismaweb.net/2010/04/maksud-perkataan-al-hikmah/, 22/7/2013.

TEORI-TEORI KEDATANGAN ISLAM DI NUSANTARA

Disediakan oleh:

Fleycylia anak Ulin

Lyana Sinda anak Gama 

PENDAHULUAN

Dalam kajian sejarah, teori memainkan peranan penting dalam menentukan kesimpulan terhadap sesuatu persoalan yang timbul. Sikap sejarawan sendiri yang mempunyai sangkaan terutama apabila berjumpa satu artifak yang signifikan akan mewujudkan kepelbagaian teori serta perdebatan untuk menentukan kesahihannya. Tiada teori yang tepat untuk membuktikan tarikh kedatangan Islam serta kawasan yang pertama menerima Islam di Nusantara.[1] Terdapat tiga teori kemasukan Islam di Nusantara iaitu melalui Arab (Parsi), India, China dan Champa . Teori-teori ini diketengahkan oleh beberapa sejarawan seperti Pijnappel, Snouck Hugronje, B. Harrison, Syed Muhamad Naquib al-Attas dan ramai lagi.

Kebanyakan sejarawan berpendapat Islam mula bertapak di Nusantara sekitar abad ke-7 atau ke-8 M, dan disebarkan oleh para mubaligh ketika aktiviti perdagangan dijalankan.[2] Islam tidak datang begitu sahaja kerana pengaruh persekitaran akan dibawa bersama oleh mubaligh ini misalnya dari China, akan membawa konsep seni dan budaya daripada China. Teori kedatangan Islam di Nusantara tidak boleh ditentukan oleh unsur dalaman sahaja kerana unsur luaran turut memainkan peranan penting dalam menentukan ketepatan teori awal kedatangan Islam di Nusantara.

Aspek dalaman merujuk kepada amalan yang diamalkan paling dominan dipengaruhi oleh unsur dari China, India atau Arab manakala unsur luaran seperti seni pertukangan, tulisan, jumpaan artifak, tapak arkeologi dan sebagainya.

 

2.0  TEORI KEDATANGAN ISLAM DARI ARAB / PARSI

Antara sejarawan awal yang mengetengahkan teori ini ialah John Crawford, Syed Muhammad Naquib al-Attas dan Prof. Dr. HAMKA merupakan antara sejarawan yang kuat mengetengahkan teori ini. Perbahasan berhubung teori ini juga sangat komplikasi dan luas perwacanaannya. Menurut John Crowford, dengan lahirnya zaman Dinasti Umaiyah dan Abbasiah, lebih jelas terbukti orang-orang Arab-Islam sudah bertapak di Nusantara.[3]

2.1  UNSUR DALAMAN

Unsur dalaman teori kedatangan Islam di Nusantara bolehlah di lihat dari segi amalan masyarakat. Konsep amalan masyarakat di Nusantara berteraskan Islam ialah kewujudan pegangan Syiah atau Sunnah yang diamalkan menyamai dengan amalan di Tanah Arab.[4]

Pada zaman Khalifah Umar bin Abd al-Aziz (717-720M), pemerintah Srivijaya yang dikenali sebagai Raja Srindavarman telah memeluk agama Islam. Srivijaya telah dinamakan sebagai “Sribuza Islam”.[5] Semasa pemerintahan Abd. Malik Marwan (685- 705M), dikatakan terdapat golongan Syiah Alawiyyin di pulau-pulau Sulu, Sulawesi dan Kalimantan.[6] Kedatangan mereka ke rantau ini dikatakan berpunca daripada aktiviti perdagangan dan melarikan diri kerana gagal dalam pemberontakan di Parsi.[7]

Sebutan dan tatacara bacaan al-Quran di Nusantara juga lebih hampir dengan sebutan dan tatacara bacaan al-Quran di Timur Tengah khususnya rantau Arab, tidak mirip pada bacaan ala penganut Islam di India mahupun China.([8]) Tatacara bacaan al-Quran jika dari India menggunakan rentak bacaan Urdu bukannya Baiyati.([9])

Berpegang kepada teori ini, ahli sejarah berpendapat kedatangan Islam dari Arab misalnya Parsi sudah bermula sejak abad ke-8 dan ke-9 M.([10])

  

2.2  UNSUR LUARAN

Teori kedatangan Islam dari segi luaran merujuk kepada aktiviti perdagangan, pengislaman raja,  dan seni pertukangan.

Teori kedatangan Islam dari Arab menurut HAMKA juga jelas dilihat melalui pengislaman raja. Merujuk kepada Hikayat Merong Mahawangsa, Maharaja Debar Raja II iaitu raja Kedah telah diislamkan pada 1136M oleh Syeikh Abdullah bin Syeikh al-Qaumiri, seorang ulama berbangsa Arab yang datang dari Yaman. Setelah memeluk Islam, Maharaja Debar bergelar Sultan Muzaffar Syah.[11]

Secara umum pada makam, batu nisan dan prasasti bentuk masjid yang terawal mirip kepada pengaruh dari Arab. Buktinya ialah batu nisan Malik al-Salih terdapat tulisan Khat Kafi pengaruh daripada Parsi yang bertarikh 1297M.[12] Hal ini membuktikan, unsur luaran seperti seni pertukangan daripada Arab membolehkan ahli sejarah menganalisis dengan lebih terperinci teori kedatangan Islam ke Nusantara.

  

3.0  TEORI KEDATANGAN ISLAM DARI CHINA DAN CHAMPA

Terdapat beberapa ahli sejarah yang berhujah teori kedatangan Islam di Nusantara adalah melalui China. Menurut Emanuel Godinho De Evedia, Islam datang ke Nusantara dari China melalui Canton dan Hainan pada kurun ke-9 Masihi.

3.1  UNSUR DALAMAN

Sukar untuk mengkaji teori kedatangan Islam ke Nusantara menerusi unsur dalaman dari China. Hal ini kerana, amalan masyarakat di Nusantara pada awalnya berunsurkan Hindu-Buddha kemudiannya Islam yang mempunyai pengaruh daripada Arab. Menerusi beberapa kajian ahli sejarah, teori kedatangan Islam boleh dilihat melalui temuan batu nisan, seni pertukangan dan catatan sejarah China.[13] Kebanyakan ahli sejarah merujuk kepada unsur luaran untuk menganalisis teori kedatangan Islam di Nusantara dari China.

3.2  UNSUR LUARAN

Unsur luaran teori kedatangan Islam dari China dikaji berdasarkan temuan batu nisan dan catatan sejarah China. Menurut S.Q Fatimi, batu nisan Fatimah binti Maimon bertarikh 1082M yang ditemui di Leran, Jawa Timur mempunyai persamaan dengan batu-batu nisan di Phan-rang, Champa Selatan 1039M dan 1035M.[14]  Batu Bersurat Terengganu yang ditemui di Kuala Berang menunjukkan bukti kedatangan Islam pada tahun 1303M. Sejarah Dinasti Shung( 960- 1279 T.M) membuat catatan tentang  kemasukan Islam di persisir pantai timur sejak tahun 977M.[15] Batu Bersurat ini menyamai batu nisan di Champa Selatan. Penemuan ini mengukuhkan hujah S.Q. Fatimi mengenai teori kedatangan Islam melalui China mulai tahun 878M.[16]

Sewaktu pemerintahan Hsi Tsung (878-879M), berlaku pemberontakan di Canton diantara penduduk tempatan dengan luar terutamanya orang Arab dan mengorbankan 100 00 nyawa orang luar.[17] Hal ini menyebabkan ramai pedagang Islam melarikan diri ke Kedah dan Palembang.[18]

Marco Polo mencatatkan bahawa beliau pernah singgah di Perlak pada kurun ke-13M dalam perlayarannya ke China dan menyatakan kewujudan kebudayaan Islam di Perlak. Catatan ini disokong Josselin De Jong bertitik-tolak pada jumpaan batu nisan di wilayah jiran Perlak iaitu Pasai. Pada fizikal sumber artifak tersebut terukir nama Sultan Malik al-Salih, iaitu nama Sultan Pasai. Pada batu nisan tersebut juga terdapat tarikh meninggal Malik al-Salih iaitu pada 1297M.

  

4.0  TEORI KEDATANGAN ISLAM DARI INDIA

Teori kedatangan Islam di Nusantara melalui India diketengahkan beberapa ahli sejarah seperti Snouck Hurgronje, Thomas Arnold dan sebagainya. Kedatangan Islam dikatakan berasal daripada Gujerat, Malabar, dan Bengal.[19]

4.1  UNSUR DALAMAN

Pegangan mazhab merupakan unsur dalaman yang wujud untuk mengkaji teori kedatangan Islam dari India. Menurut G.P Moquette, Islam di Nusantara disebarkan melalui Gujerat berdasarkan penemuan batu nisan di Pasai bertarikh 1428M.[20] Teori ini disanggah oleh Thomas Arnold yang menyatakan bahawa pada ketika itu, anutan mazhab penduduk di Gujerat adalah Hanafi sedangkan anutan penduduk di Nusantara adalah Syafie.[21] Hujah Thomas disokong oleh B. Harrison berdasarkan hujah  Bengal lebih dahulu menerima Islam berbanding Gujerat iaitu sejak awak abad ke-13M.[22]

4.2  UNSUR LUARAN

Teori kedatangan Islam melalui Gujerat dipegang kukuh oleh G.P Moquette berdasarkan kajian terhadap temuan batu nisan Maulana Malik Ibrahim di Gerisik bertarikh 1419M. Batu nisan ini mempunyai persamaan dengan batu nisan Umar ibn Ahmad yang ditemui di Gujerat berdasarkan seni pembuatannya. Justeru, beliau membuat hipotesis bahawa kedua-duanya berasal dari Gujerat. Kajian ini disokong kuat oleh R.A. Kern, W.F. Stutterheim dan J. Gonda bahawa Islam di Nusantara berasal dari Gujerat. Namun teori ini mempunyai kelemahan kerana berdirinya kerajaan Pasai pada 1042M, Gujerat masih belum menerima Islam.[23]

Tom Pires didalam bukunya Suma Oriental menyatakan bahawa Sultan Malik al-Salih yang menjadi raja pertama di Pasai berketurunan Benggali.[24] Oleh kerana Pasai merupakan negeri pertama menerima Islam, S.Q. Fatimi berhujah bahawa teori kedatangan Islam adalah dari Bengala. Walaubagaimanapun, hujah ini tidak dapat diterima sebagai fakta sejarah kerana tiada bukti kukuh salasilah Sultan Malik berketurunan Benggali.[25]

KELEMAHAN TEORI ISLAM DATANG DARI INDIA

Walaupun sarjana dan orientalis Barat berpegang dengan pandangan mereka bahawa Islam datang ke Nusantara adalah atas ‘tugas’ orang India, namun sejarawan serta sarjana Muslim dan tempatan seperti Syed Muhammad Naquib al-Attas dan S.Q Fatimi juga mempunyai pendapat dan bukti tersendiri untuk menolak dakwaan dan kenyataan serta hujah-hujah Barat dengan mengatakan bahawa Islam datang ke Nusantara adalah dibawa oleh orang Arab. Teori bahawa Islam dibawa secara langsung oleh orang Arab ke Kepulauan Melayu dikemukakan oleh Syed Muhammad Naquib al-Attas dalam bukunyaIslam in the Malay Culture and History.[26]Beliau menjelaskan bahawa fakta-fakta yang menjadi dasar kepada teori yang pertama dan kedua[27]hanya merupakan faktor ‘luaran’ atau dengan perkataan lain boleh dikategorikan sebagai faktor yang dangkal dan boleh dipersoalkan.

Pertama, pendakwah-pendakwah lama Islam di daerah Asia Tenggara terdiri daripada orang Arab berdasarkan nama dan gelaran masing-masing. Nama dan gelaran ini sama sebutan dan sifatnya dengan nama dan gelaran yang terdapat di Tanah Arab. Oleh itu, teori yang mengatakan Islam datang dari India dapat disangkal berikutan ramai pendakwah lama yang telah bermastautin di Asia Tenggara sekaligus menolak teori Barat.[28] Kedua, beliau menyangkal pandangan Mouqette yang mengatakan bahawa beberapa batu nisan didapati di Pasai dan Gersik mempunyai persamaan dengan batu nisan di Gujerat, kenyataan ini tidak sepatutnya membuktikan teori Islam di Asia Tenggara di bawa dari India kerana kedudukan kawasan Asia Tenggara dengan India adalah berdekatan, oleh yang demikian tidak menjadi suatu permasalahan sekiranya barang-barang yang terdapat di Gujerat akan sampai ke Pasai dan Gersik.[29] Justeru, bagi beliau untuk membuktikan kedatangan Islam ke Nusantara dalam skop persoalan dari mana dan siapa yang membawanya serta tarikh penting kedatangan Islam seharusnya berdasarkan penelitian terhadap bahasa dan kesusasteraan yang sememangnya diakui menjadi bahan tinggalan sejarah yang konkrit dan diguna pakai oleh masyarakat Nusantara.

Syed Naquib al-Attas mendapati bahawa jika ditinjau semua hasil kesusasteraan keagamaan yang telah merujuk kepada sumber-sumber tulisan lama Islam di Asia Tenggara, didapati bahawa tiada satu pun laporan, rujukan atau sebutan yang merujuk kepada penulis India atau kitab yang berasal dari India dan digubah sendiri oleh orang India. Sebaliknya jika diteliti, kitab-kitab yang didakwa berasal dari India oleh sarjana Barat sebenarnya kitab yang ditulis oleh penulis bangsa Arab dan kitab-kitab ini sebenarnya dibawa dari Arab atau Timur Tengah yang segelintirnya singgah ke India.

Seterusnya kelemahan yang ketara yang terdapat pada teori sarjana Barat yang mendakwa Islam di Asia Tenggara berasal dari India boleh dilihat melalui skop pentarikhan kedatangan Islam yang didakwa datang dari India ini. Berdasarkan tarikh pada batu nisan di Pasai iaitu 1428 masihi dan batu nisan Malik Ibahim di Grisek yang bertarikh 1419 masihi yang seakan-akan sama dengan batu nisan ‘Umar ibn Ahmad kazaruni di Gujerat, maka Moquette membuat kesimpulan bahawa kedua-duanya dibawa dari Gujerat. Walhal pada hakikatnya, pada masa terdirinya kerajaan Pasai iaitu pada tahun 1042, Gujerat belum lagi menerima agama Islam. Sebaliknya, hanya pada tahun 1301 Gujerat menjadi negara jajahan Delhi setelah Sultan Alauddin berjaya merebutnya daripada kekuasaan Hindu.[30]

Sebelum itu, apabila kita meneliti dari sudut pentarikhannya dengan menerima bahawa Islam datang dari Gujerat, bermakna Islam hanya sampai ke Asia Tenggara bermula pada abad ke-13. Sedangkan terdapat banyak bukti yang menunjukkan Islam telah datang lebih awal sebelum abad ke-13.[31] Contohnya, dalam Ensiklopedia Tematis Dunia Islam jilid 7, Islam telah masuk ke Asia Tenggara melalui jalan perdagangan sejak abad ke-7 lagi.[32]

Bukti lain yang menunjukkan Islam telah datang lebih awal sebelum abad ke-13 ialah bukti arkeologi sebagaimana di Phanran Selatan Campa ahli arkeologi telah menjumpai batu nisan yang menggunakan tulisan Arab Kufi yang menyebutkan nama seorang Islam yang meninggal dunia iaitu Ahmad bin Abu Ibrahim ( 29 safar 431 H/1039M ). [33] Bukti ini telah menunjukkan bahawa Islam telah bertapak lebih awal bukan seperti yang didakwa oleh Pijnappel. Menerusi isu pentarikhan ini juga, kita dapat menilai tentang kelemahan fakta yang dibawa oleh Pijnappel berdasarkan sejarah Gujerat itu sendiri. Gujerat diperintah oleh orang Islam bermula  pada tahun 1298M iaitu pada awal abad ke-13[34]sebagaimana yang dijelaskan sebelum ini. Oleh itu, mustahil Gujerat yang baru berjinak dengan Islam ini boleh menyebarkan Islam ke tempat lain khususnya di benua Asia Tenggara.

Seterusnya, teori Pijanppel juga boleh dinilai faktanya berdasarkan keadaan geografi daerah Gujerat. Sekiranya diteliti daerah Gujerat terletak di bahagian barat daya India[35] yang merupakan kawasan persisiran pantai dan menjadi laluan para pedagang Arab untuk singgah berdagang di sana. Di samping para peniaga Arab itu berdagang, mereka juga telah berkesempatan menyebarkan Islam sehingga mereka berjaya menduduki pusat pelabuhan penting termasuk Gujerat dan Malabar.[36] Usaha dakwah para peniaga Arab ini telah membuahkan hasil berikutan Gujerat sebelum ini di bawah pemerintahan raja-raja Solanki iaitu raja-raja Hindu dari Anahilwada telah digantikan dengan pemerintahan Islam sehingga berkekalan pada awal abad ke-16.[37] Oleh itu, dapat dinyatakan bahawa Islam telah berkembang pesat  di Asia Tenggra pada abad ke-13 dan diterima baik oleh masyarakat di sini berikutan ajarannya yang mudah diterima dan mampu berhadapan dengan pelbagai bentuk situasi masyarakat di Asia Tenggara.[38]

Kenyataan Pijnappel bahawa Islam datang dari India melalui persamaan mazhab di India dengan mazhab di Asia Tenggara iaitu mazhab Syafie,[39] telah dipertikaikan oleh Thomas Arnold seperti yang dipetik dalam buku Pentadbiran Undang-undang Islam Negeri Johor,berpendapat Gujerat bukanlah tempat yang membawa Islam ke Nusantara, sebaliknya Benggala di Coromandel atau Malabar di selatan India. Menurutnya lagi, Mazhab Islam yang diamalkan di Gujerat ialah mazhab Hanafi sedangkan di Nusantara Mazhab Syafie.[40] Marrison yang menyokong teori Pijnappel ini dengan mengatakan hujah yang sama, dibidas oleh oleh pandangan S.Q Fatimi dengan mengatakan bahawa orang India mengamalkan Mahzab Hanafi, manakala orang Islam di Malaysia berpandukan Mahzab Syafi’i[41] sekali gus bersetuju dengan pandangan Arnold. Menurut beliau, amat sukar untuk masyarakat membuat penukaran mahzab berikutan kesukaran untuk menukar kepercayaan mereka atas dasar persepsi mereka terhadap ajaran asal.[42]

 

TAHAP PERSINGGAHAN, PERTAPAKAN DAN PENYEBARAN PENGARUH

Sebenarnya kedatangan islam di nusantara dapat di bahagikan kepada tiga tahap iaitu tahap persinggahan, tahap pertapakan, dan tahap penyebaran pengaruh secara besar-besaran.
Mengenai tahap pertama, ia berlaku sebagai kelangsungan dari kegiatan perdagangan yang berjalan sejak sebelum kemunculan islam lagi.Ada dua teori yang pernah di kemukakan tentang hubungan arab dengan Asia Tenggara.Pertama, hubungan secara langsung dan kedua hubungan secara tidak langsung.Mengenai hubungan secara langsung, ini berlaku berikutan dari keperluan barangan yang membawa pedagang-pedagang Arab dari Parsi ke Nusantara.Diantara barang-barang tersebut ialah lada, rempah, kemenyan dan kapur barus.
Mengenai hubungan secara tidak langsung ini, berlaku apabila pedagang-pedagang Arab dan Parsi menjalankan kegiatan perdagangan dengan China.Memang di akui terdapatnya jalan darat melalui pelabuhan Oc-eo di Funan, tetapi pada umumnya pedagang-pedagang Arab menggunakan jalan lautan, melintasi pesisir India dan Asia Tenggara menurut musim angin.Dalam kegiatan ini mereka menjadikan kawasan Nusantara sebagai tempat persinggahan.
Selepas itu timbul pula tahap kedua di mana terdapat kesan-kesan pertapakan Islam di Asia tenggara.Ini berlaku sepanjang zaman Bani Umayyah (661-750) dan Bani Abasiyyah (750-1258) .Bukti yang selalu di sebutkan ialah tahun674 M.di mana di katakan sudah terdapat penempatan orang-orang Arab-Islam di pantai barat sumatera.Bahkan juga di katakan pada tahun yang sama terdapat orang-orang Ta-Shih di Jawa, iaitu orang-orang Arab atau Parsi yang beragama Islam.Tragedi yang menimpa umat Islam di China yang kesannya turut di rasai oleh Nusantara.

Tragedi pertama ialah pada tahun 878 M apabila tercetusnya pemberontakan oleh Hwang Chao do Canton yang menyebabkan terbunuhnya seramai 100, 000 orang asing dan kebanyakkannya orang-orangg Islam dan Arab.Akibat peristiwa ini ramai pedagang-pedagangg Islam yang melariakn diri ke Kedah dan Palembang.

Demikian juga pada masa akhir Dinasti Tang (618-905) seramai 5000 rakyat asing telah di bunuh oleh pemberontak yang di pimpin oleh Tien Sheng Kong di wilayah Yang Chow.Mereka terselamat lalu melarikan diri ke tempat yang selamat, termasuk Nusantara.
Penghijrahan pelarian-pelarian tersebut dari China juga menunjukkan yang Islam du nusantara datang melalui negeri China.Dan hujah ini dapat di perkuatkan denagn penemuan batu nisan yang bertarikh 419H/1028m.di Pekan Pahang.dan juga Batu Bersurat yang bertarikh 702h/1303M. di Kuala Brang Terengganu.Adapun mengenai tahap ketiga, ia berlaku selepas jatuhnya Baghdad pada tahun 1258M akibat serangan Mongol.Dengan kejatuhan ini bukanalh menjadikan dakwah Islam di Nusanatra terbantut, bahkan sebaliknya ia berlaku secara besar-besaran.Oleh Prof. M.A Rauf (Rektor pertama UIAM) di katakannya bahawa perkembangan Islam selepas kejatuhan Baghdad ini merupakan peringkat peralihan agama secara besar-besaran (Mass Conversion) .Dalam peringkat ini pihak yang memainkan peranan penting ini bukan sahaja daripada kalangan orang-orang Arab dan Parsi malah juga orang-orang Indiadan anak tempatan Nusantara sendiri.Mengenai peranan orang Arab, yang pertama sekali di ketahui ialah Syeikh Ismail All-Siddiq yang di utuskan oleh Syariff Makkah.Bersama-sama dengan Faqir Muhammad dari Malabar, Syeikh Ismail menuju ke Sumatera dan khususnya Pasai lalu mengislamkan Merah Silu (1261-1289) .Dan ketika Melaka di perintah oleh Raja Kechik Besar datang seorang Makhdum dari Jeddah, Sayyid Abdul Aziz telah mengislamkan orang Melaka ini.

KESIMPULAN            

      Pelbagai teori dan pendapat yang dikemukakan oleh para sarjana tentang kedatangan Islam ke Nusantara. Teori-teori yang dikemukakan oleh para sarjana ini sememangnya ada kebenaran. Namun begitu, jika dibandingkan teori kedatangan Islam dari India dengan bukti-bukti arkeologi sahaja, teori ini adalah amat lemah dan boleh disangkal. Tambahan pula, perselisihan dari sudut pentarikhan menyebabkan teori kedatangan Islam ke Nusantara adalah berasal dari India boleh dinilaikan kelemahannya. Biarpun terdapat persamaan mazhab antara ajaran Islam di Asia Tenggara dengan daerah Gujerat, Malabar dan Pantai Coromandel seterusnya beberapa kawasan yang berkaitan, namun ia masih tidak boleh membuktikan bahawa Islam di Asia Tenggara secara langsung adalah berasal dari India.Manakala teori kedatangan Islam di nusantara dari China  dapat dilihat melalui hubungan perdagangan antara orang-orang Arab dengan China yang dikatakan telah berlaku sejak sebelum kelahiran agama Islam lagi. Mereka membawa barang-barang dagangan seperti mutiara, sutera dan tembikar dari China. Perdagangan antara Arab dengan China secara tidak langsung mewujudkan hubungan antara China dengan Kepulauan Melayu.Walaubagaimanapun, tiada unsur India dan China dalam kitab yang dikarang oleh ulama tempatan iaitu  kitab tempatan seperti tauhid, tafsir al-Quran dan hadis mengunakan bahasa Arab dan sumber rujukan dari Semenanjung Tanah Arab.Sebagaimana yang dinyatakan oleh Syed Muhammad Naquib Al-Attas, walau apapun perbezaan teori dan hujah orientalis Barat, beliau tetap mengatakan bahawa memang Islam datang ke Nusantara atas peranan pedagang Islam dari Tanah Arab. Kebanyakan kitab agama yang dikarang dalam bahasa Melayu mengunakan bahasa dan gaya tulisan bahasa Arab.Jadi dapat saya simpulkan disini teori kedatangan islam di nusantara melalui Semenanjung Tanah Arab adalah lebih kukuh dengan adanya bukti-bukti yang kuat.

SENARAI   RUJUKAN

      Buku

  • Mohammad Redzuan Othman,2005.Islam dan Masyarakat Melayu,Kuala Lumpur:Universiti Malaya
  • Hashim Musa,Zainal Abidin Borhan,Othman Mohd Yatim,Ahmad Hakimi Khairuddin,Mohd Taufik Arridzo Mohd Balwi,2006.Tamadun Islam dan Tamadun Melayu,Kuala Lumpur:Universiti Malaya

Laman Web

(22 Ogos 2013)

(25 Ogos 2013)

(29 Ogos 2013)

 

 

[1] Ismail Hamid, 1986, Perkembangan Islam di Asia dan Alam Melayu, Heinemann Sdn. Bhd. Hlm.53.

[2] Sejarah Masuknya Islam ke Indonesia, 1963, Panitia Sejarah Indonesia.

[3] Abdullah Ishak, 1992, Islam di Nusantara, Maskha Sdn. Bhd: Kuala Lumpur.  Hlm. 56.

[4] Mahayudin Haji Yahaya, 1993, Sejarah Islam. Fajar Bakti Sdn. Bhd. Hlm. 557.

[5]Zainal Abidin Ahmad, 1979, Sejarah Islam dan Umatnya jilid V, Bulan Bintang: Jakarta. Hlm. 136.

[6] Sayid Alwi, 1957, Sejarah Perkembangan Islam di Timur Jauh, Dhiya Shahab al-Maktab al-Daini. Hlm. 51.

[7] S.Q. Fatimi, 1963, Islam Comes to Malaysia, MSRI: Singapore. Hlm. 53.

[8] M.B. Hooker, 1991, Undang-Undang Islam di Asia Tenggara, DBP: Kuala Lumpur. Hlm,2.

[9] Dasuki Ahmad, 1974, Ikhtisar Perkembangan Islam. DBP: Kuala Lumpur.

[10] Abdul Rauh Yaakob, 1994, Lembaran Sejarah dan Tamadun Islam, DBP: Kuala Lumpur. Hlm. 73.

[11] Abdullah Ishak, 1992, Islam di India, Nusantara dan China, Nurin Enterprise: Kuala Lumpur. Hlm. 104.

[12] Abdullah Ishak, 1992, Islam di Nusantara( khususnya di Tanah Melayu), Maskha. Sdn. Bhd.. Hlm. 136.

[13] D.G.E Hall, 1964, A History of South East Asia. Macmillan: London. Hlm 19s.

[14]A.Habib Alwi, 1995,  Sejarah Masuknya Islam di Timur Jauh. Lantera Basritama: Jakarta. Hlm 43.

[15] Ismail Hamid, 1986, Perkembangan Islam di Asia dan Alam Melayu, Heinemann. Sdn. Bhd. Hlm. 55.

[16] S.Q. Fatimi, 1963, Islam Comes to Malaysia, MSRI: Singapore. Hlm. 37.

[17] Ibrahim T.Y. Ma, 1979, Perkembangan Islam di Tiongkok, Bulan Bintang Enterprise: Jakarta. Hlm. 50.

[18] S.M.N. al-Attas, 1969, Preliminary Statement on a General Theory of the Islamization of the Malay-Indonesian Archipelago, Dewan Bahasa dan Pustaka: Kuala Lumpur. Hlm. 11.

[19] Abd. Rahman Abdullah, 1981, Sejarah dan Pemikiran Islam, Pena Sdn. Bhd. Hlm. 239.

[20] Slametmuljana, 1981, Kuntala, Srivijaya dan Suwarnabhumi, Yayasan Idayu: Jakarta. Hlm. 267.

[21] Abdullah Ishak, 1992, Islam di India, Nusantara dan China, Nurin Ent. Hlm. 105.

[22] Thomas Arnold, 1968, The Preaching of Islam, Lahore. Hlm. 318.[23] S.M.N. al-Attas, 1972, Islam dalam Sejarah dan Kebudayaan Melayu. UPM. Hlm.18.

[24] S.Q. Fatimi, 1963, Islam Comes to Malasysia. Hlm. 25.

[25] Sejarah Masuknya Islam ke Indonesia, 1963, Panitia Seminar Sejarah Indonesia.

 

Soalan-soalan Tahun Lepas CTU 263

MAC 2013

BAHAGIAN A

Soalan 1

Firman ALllah SWt bermaksud:

“Wahai orang yang beriman, taatlah kamu kepada Allah dan taatlah kamu kepada Rasulullah dan kepada “Ulil-Amri” (orang yang berkuasa) dari kalangan kamu, kemudian jika kamu berbantah-bantah (berselisihan) dalam sesuatu perkara, maka hendaklah kamu kembalikannya kepada (kitab) Allah (al-Quran) dan (Sunnah) Rasul-Nya – jika kamu benar beriman kepada Allah dan hari akhirat, yang demikian adalah lebih baik (bagi kamu), dan lebih elok pula kesudahannya.” (an-Nisa’: 59)

Mafhum daripada ayat di atas menggambarkan sunnah sebagai sumber wahyu yang kedua dalam ajaran Islam dan mendidik umat Islam mengenai nilai keutamaan dalam membuat sebarang keputusan.

Jawab soalan berikut:
(a) Jelaskan secara ringkas EMPAT (4) matlamat pengurusan Islam. (8 markah)
(b) Huraikan TIGA (3) fungsi al-Sunnah sebagai sumber kedua wahyu dalam pengurusan Islam. (9 markah)
(c) Bincangkan SATU (1) aplikasi fiqh keutamaan (fiqh al-awlawiyyat) dalam pengutusan Islam. (3 markah)

BAHAGIAN B

Soalan 1

Firman Allah SWT yang bermaksud:

“Wahai sekalian manusia! Beribadatlah kepada Tuhan kamu Yang telah menciptakan kamu dan orang-orang Yang terdahulu daripada kamu, supaya kamu (menjadi orang-orang yang) bertaqwa.” (al-Baqarah: 21)

Ibadah dalam Islam bukan hanya melaksanakan rukun Islam seperti solat, puasa, zakay dan haji tetapi ia jua mencakupi bidang
pengurusan.

(a) Berikam maksud konsep kerja sebagai ibadah dan syarat-syaratnya. (4 markah)
(b) Huraikan DUA (2) implikasi pelaksanaan ubudian dalam pengurusan organisasi. (5 markah)
(c) Bincangkan DUA (2) aplikasi ubudiah bagi melahirkan pekerja yang berjaya di dunia dan akhirat. (6 markah)

Soalan 2

Firman Allah SWT yang bermaksud:

“…. Yusuf menjawab: “Hendaklah kamu menanam bersungguh-sungguh tujuh tahun berturut-turut, kemudian apa yang kamu ketam biarkanlah dia pada tangkai-tangkainya; kecuali sedikit dari bahagian yang kamu jadikan makan. Kemudian akan datang selepas tempoh itu, tujuh tahun kemarau yang besar, yang akan menghaniskan makanan yang kamu sediakan baginya; kecuali sedikit dari apa yang kamu simpan (untuk dijadikan benih). Kemudian akan datang pula sesuadah itu tahun yang padanya orang ramai beroleh rahmat hujan, dan padanya mereka dapat memerah (hasil anggur, zaitun dan sebagainya)”.

Beerdasarkan maksud ayat di atas:

(a) Berikan DUA (2) kepentinan perancangan dalam pengurusan Islam (4 markah)
(b) Huraikan DUA (2) perancangan dalam hijrah Rasulullah SAW ke Madinah. (5 markah)
(c) Bincangkan DUA (2) proses perancangan dalam mencapai keputusan terbaik. (6 markah)

Soalan 3

Islam amat menekankan kemahiran komunikasi yang efektif bagi melicinkan perjalanan sesebuah komunikasi.

Berdasarkan pernyataan di atas
(a) Terangkan DUA (2) metod komunikasi menurut Al-Quran. (4 markah)
(b) Huraikan DUA (2) fungsi komunikasi menurut Islam. (5 markah)
(c) Bincangkan DUA (2) etika komunikasi berkesan dalam mewujudkan suasana harmoni sesebuah organisasi. (6 markah)

Soalan 4

Kaedah fiqh didefinisikan sebagai kaedah umum yang disimpulan daripada nas syarak (al_Quran dan Sunnah) dan dapat diaplikasikan kepada permasalahan fiqh hasil usaha para mujtahid.

Berdasarkan pernytaan di atas.
(a) Berikan maksud kaedah al-dharar yuzal dan al-adah muhakkamah. (4 markah)
(b) Jelaskan DUA (2) kepentingan kaedah al-adah muhakkamah yang digunakan dalam pengurusan (5 markah)
(c) Bincangkan DUA (2) aplikasi kaedah al-dharar yuzal dalam pengurusan Islam. (6 markah)

APRIL 2011

Soalan 1

“Wahai umat manusia! Sesungguhnya Kami telah menciptakan kamu dari lelaki dan perempuan, dan Kami telah menjadikan kamu berbagai bangsa dan bersuku puak, supaya kamu berkenal-kenalan (dan beramah mesra antara satu Dengan Yang lain). Sesungguhnya semulia-mulia kamu di sisi Allah ialah orang Yang lebih taqwanya di antara kamu, (bukan Yang lebih keturunan atau bangsanya). Sesungguhnya Allah Maha Mengetahui, lagi Maha mendalam pengetahuannya (akan keadaan dan amalan kamu).” (al-Hujurat: 13)

Berdasarkan maksud ayat di atas, jelaskan:

(a) Maksud al-musawah (persamaan). (2 markah)
(b) TIGA (3) kepentingan prinsip a-musawah dalam sesebuah organisasi. (9 markah)
(c) TIGA (3) aplikasi prinsip al-musawah dalam sesebuah organisasi (9 markah)

Soalan 2

Objektif oengurusan Islam secara khususnya ialah untuk memelihara segala nilai-nilai yang diperlukan oleh manusia dalam kehidupan mereka demi mencapai keharmonian dan kesejahteraan hidup.

Berdasarkan pernyataan di atas, jelaskan:

(a) Maksud pengurusan Islam. (2 markah)
(b) EMPAT (4) objektif pengurusan Islam. (12 markah)
(c) TIGA (3) hierarki maslahah (keperluan) dalam pengurusan Islam. (6 markah)

Soalan 3

“Sesungguhnya Allah menyukai seseorang kamu yang apabila melakukan sesuatu pekerjaan dia melakukan dengan komited (itqan).”
(Hadis Riwayat Bukhari)

Berdasarkan maksud hadis di atas, huraikan:

(a) Empat (4) kepentingan penghayatan etika kerja Islam dalam sesebuah organisasi. (10 markah)
(b) Empat (4) contoh aplikasi etika kerja Islam. (10 markah)

Soalan 4

Kaedah fiqh dadalah satu mekanisma yang diamalkan dalam pengurusan islam unyuk menangani keperluan dan perubahan semasa.

Berdasarkan pernyataan di atas, jelaskan:

(a) Maksud al-masyaqqah tajlibu al-taisir (kesukatan mendatangkan kesenangan). (2 markah)
(b) EMPAT (4) keadaan yang membuka ruang keringan kepada penjawat awam. (8 markah)
(c) EMPAT (4) aplikasi kaedah al-masyaqqah tajlibu al-taisir dalam pengurusan sesebuah organisasi. (10 markah).

Soalan 5

“Wahai Daud, Sesungguhnya Kami telah menjadikanmu khalifah di bumi, maka jalankanlah hukum di antara manusia Dengan (Hukum syariat) Yang benar (yang diwahyukan kepadamu); dan janganlah Engkau menurut hawa nafsu, kerana Yang demikian itu akan menyesatkanmu dari jalan Allah. Sesungguhnya orang-orang Yang sesat dari jalan Allah, akan beroleh azab Yang berat pada hari hitungan amal, disebabkan mereka melupakan (jalan Allah) itu.” (Sad: 26)

Berdasarkan maksud ayat di atas, huraikan perkara-perkara berikut mengikut perspektif Islam.

(a) EMPAT (4) sifat pemimpin. (10 markah)
(b) EMPAT (4) peranan utama pemimpin. (10 markah)

UJIAN PERTENGAHAN TAHUN

UJIAN PERTENGAHAN TAHUN AKAN DIADAKAN SEPERTI BERIKUT:

KELAS CTU 101 -
AP1161A, AP1161B – SELASA 20 OGOS 2013 – PUKUL 12.00-1.00 PM – BILIK M288 (BILIK BERTUKAR)

KELAS CTU 151 -
BM1112A, BM1112B - SELASA 20 OGOS 2013 – PUKUL 5.00-6.00 AM – BILIK B333

KELAS CTU 151 -
AS1202A, SR1132A, SR1132B - RABU 21 OGOS 2013 – PUKUL 9.00-10.00 AM – BILIK AUDI 1

KELAS CTU 101 -
CS1101A, CS1101B, EH1101A, EH1101B- RABU 21 OGOS 2013 – PUKUL 3.00-4.00 PM- BILIK DK3

KELAS IDA 152 -

AT1102A, AT1102B – KHAMIS 22 OGOS 2013 – PUKUL 3.00-4.00 PM  - BILIK AUDI 1

KELAS CTU 263 -
BM1183A, BM1183B, BM11183D – SABTU 17 OGOS 2013 – PUKUL 9.30-11.00 AM – BILIK DK3 (M291)

INSYAALLAH